शिकायत नहीं
शिकायत नहीं स्वरांगी साने सब कुछ तयशुदा समय पर हो रहा था दिन ढल रहे थे रातें जा रही थीं सब कुछ था जीवन में सिवाय तुम्हारे। एक दिन किसी ने बताया वहाँ उस वृक्ष के नीचे बैठे हो तुम समाधिस्थ वो दौड़ पड़ी पर जैसे दूर-दूर होते चले गए वृक्षों के झुरमुट किस वृक्ष के नीचे खोजती तुम्हें वो रही अनजान। उसने उठा लिया वहीं पड़ा बाँस का टुकड़ा फूँक दिए प्राण। एक के बाद दूसरी फिर तीसरी-चौथी अनगिनत तानें निकलती गईं बिखरते गए सुर पर वे भी नहीं खोज पाए तुम्हें। वो दौड़ती रही वन प्रदेशों में चुभते रहे पैरों में काँटे बिना रोली ही छोड़ते गए उसके निशान जंगलों में वो उठाती चली गई मोरपंखों को उनमें कहीं मिल जाओगे तुम शायद पर ऐसा नहीं होना था नहीं हुआ। कितने दिन बीते ये भी याद नहीं आसमान होने लगा श्यामवर्णी और बिजली की कौंध-सी छाने लगी सफ़ेदी बालों में आकाश का कालापन आँखों के नीचे जमता चला गया। उसने देखी पानी में अपनी छवि पर उसमें दिखाई देती रही उसे तुम्हारी ही मूरत। वो तुम्हें खोजती रही इस खोज का कोई अंत नहीं जैसे कोई मुक्ति नहीं इस श्राप से। पर अब उसने जान लिया है इस सत्य को और खुद को मुक...