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https://www.youtube.com/watch?v=vDiXTzGQrGQ&list=UUNAiLAogzUDdSKwCmF3kQMg
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प्रेम दिवानी मीराबाई के जीवन वृत्त को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हैं, पुणे से *स्वरांगी साने*
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*मीराबाई* का कृष्ण प्रेम जग जाहिर है किन्तु इस प्रेम ने उनसे क्या-क्या करवाया, यह शायद ही सबको पता हो। विवाह न करने का हठ, विवाहोपरांत भी कृष्ण के प्रेम में मग्न रहना और पति की मृत्यु के बाद भी वैधव्य न स्वीकारना... ऐसी क्रांतिकारी प्रेमिका जिसने कान्हा के मोह के आगे सबकुछ न्योछावर कर दिया, आज *साहित्यकार तिथिवार* का पटल पावन कर रही हैं। प्रेम दिवानी मीराबाई के जीवन वृत्त को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हैं, पुणे से *स्वरांगी साने* ।। https://hindisepyarhai. blogspot.com/2021/12/blog- post_16.html?m=1 *हिंदी से प्यार है* की प्रस्तुति
https://www.youtube.com/watch?v=HbtLjUVxxPA&list=UUNAiLAogzUDdSKwCmF3kQMg
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स्वरांगी साने के कविता संग्रह और उनकी रचनाओं की मार्मिक अनुभूतियों पर विजय कुमार मल्होत्रा की समीक्षा रिपोर्ट
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जब भी उससे पूछा जाता है, ‘कैसी हो’ तो वह हँस देती है। पूछते हैं उससे-इसमें हँसने की क्या बात ! हाँ हँसने वाली कोई बात नहीं होती..दर असल वह रोना चाहती है और सब कहते हैं ‘वह हँसती बहुत है’।... पढ़िये स्वरांगी साने के कविता संग्रह और उनकी रचनाओं की मार्मिक अनुभूतियों पर विजय कुमार मल्होत्रा की समीक्षा रिपोर्ट। https://indorestudio.com/dar- asal-wo-rona-chahati-hai/
शहर की छोटी सी छत पर/ स्वरांगी साने
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वाराणसी से प्रकाशित पत्रिका सच की दस्तक के नवंबर 2021 के अंक में शहर की छोटी सी छत पर स्वरांगी साने बचपन में खेला करते थे गाँव गाँव बन जाता था कोई भी कप्तान बाँट देता था काम लड़कियाँ घरकुल बनातीं लड़के पिस्तौल से डराते दुश्मन को तब कोई नहीं चाहता था बनना बच्चा बन जाता था मम्मी- पापा पनवारी,धोबी, मोची, दुकानदार, ग्राहक, नौकर, स्कूल टीचर या हेडमास्टर शहर की एक छोटी सी छत पर बस जाता था पूरा गांव जो आज चमार बनता अगले दिन वो मास्टर बन जाता चपरासी हो जाता पोस्टमैन दुकानदार बदल जाता ग्राहक में दूसरे दिन कोई और ही होता कप्तान लड़कियां फिर संभालती घरकुल लड़के पिस्तौल रोज खेल होने पर कर लेते चट्टा-मट्टा खेलते दूसरा नया खेल सितौलिया छिपाछाई विष अमृत नदी पहाड़ या फिर वहीं गाँव गाँव आज हम बड़े हो गए हैं मिल गया है लाइसेंस पिस्तौल का वह मोची ही लगता है मंटू नहीं पान की दुकान पर दूसरी सहेलियों की तरह मैं भी नहीं जाती जबकि बैठता है वहाँ संजू ही अब रोज़-रोज़ नहीं बदलता चित्र रघु के डाक देने आने पर नहीं पूछते मामाजी की चिट्ठी आई डरने लगे हैं कप्तान से हर दिन नहीं बदलता अब कप्तान टोनू, पिंकी, रीनी...
मुनिया की दुनिया
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मुनिया की दुनिया किस्सा 10 कोई बड़ी फिल्मी हिरोइन आज हमारी सोसाइटी में आई है..लोगों में ग़ज़ब का उत्साह और उसे देखने के लिए बड़ा मजमा लगा है..बच्चे कैसे अछूते रहते…उनका हुजूम भी निकल पड़ा है, ऑटोग्राफ़ की डायरी लेकर…बच्चों में मुनिया भी तो है…ठुमक ठुमक कर चल रही है.. सबसे अच्छे कपड़े पहने हैं, एकदम चुनकर निकाला ड्रेस, धूप से बचने के लिए सिर पर टोपी, गॉगल्स..पैरों में काली जूती…एकदम हिरोइन को टक्कर देती-सी तैयार है मुनिया… और अब सुनिए मुनिया के श्रीमुख से- ‘मैं उस हिरोइन को कहूँगी तुम मेरा ऑटोग्राफ लो, तो मैं तुम्हारा ऑटोग्राफ लूँगी…’ तो बोलो धन्य है न मुनिया (क्रमशः)
सूने घर में बच्चे/ सूने घर में बच्चे
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सूने घर में बच्चे स्वरांगी साने वे लौटते हैं घर उनके कंधों पर होता है बोझ बस्तों का वे खोलते हैं किवाड़ परे रखते हैं बस्ता हावी हो जाती है तन्हाई। उनकी थकी आँखों में भर जाती हैं उदासी। वे तन्हाई में करते हैं बातें दीवारों से सूने घर में अक्सर बच्चे अपने माँ-बाप की आवाज़ तलाशते हैं । ( इसमें असमीया, अंग्रेजी, उड़िया, उर्दू, कश्मीरी, कन्नड़, कोंकणी, गुजराती,डोगरी,तमिल, तेलगु,नागा, नेपाली, पंजाबी, ब्रज, बंगाली,बोडो, भोजपुरी, मणिपुरी, मलयालम, राजस्थानी, संथाली, संस्कृत, सिंधी और हिंदी भाषा से अनुदित कविताएं हैं)
ठटकर ठ की बातें
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https://www.atarman.com/hi/post/tha-se-shabd होम ठटकर ठ की बातें ठटकर ठ की बातें 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star Thank you for your feedback! Swaraangi Sane भाषा नवम्बर 30, 2021 0 पठन सूची में जोड़ें वे दिन याद हैं जब किसी के यहाँ जाते थे तो दरवाज़े पर ठक-ठक करने की ज़रूरत भी नहीं होती थी, ठिठुरती सर्दियों की ठंडी दुपहरी में ठार (बहुत सर्दी) पड़ती, तो आँगन में हँसी-ठिठोली, हँसी-ठट्ठा और ठहाकों से गर्माहट आ जाती थी। अंताक्षरी खेलने पर जब भी ‘ठ’ आता तो दो ही गाने गाए जाते थे- ‘ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए’ और ‘ठाढे रहियो’...उसके बाद ‘ठ’ आने पर खेल ठिठक जाता । कहीं आना-जाना हो तो सार्वजनिक परिवहन से ठसाठस ठूँस कर लोग आया-जाया करते थे, कहीं भीड़ जमा हो जाती तो ‘ठट लगना’ कहते थे और किसी को यह समझ न आए और उसे ‘ठस दिमाग’ कह देने पर वो भी बुरा नहीं मानता था , उसे एक मीठी-सी ठंडी चोट समझता था पर ‘ठस आदमी’ कहने पर बुरा मान जाता क्योंकि उसका अर्थ संबंधित को कंजूस कह देना होता है। फिर ...
मुनिया की दुनिया किस्सा 9
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https://www.atarman.com/hi/post/muniya-ki-duniya-kissa-9 मुनिया की दुनिया Swaraangi Sane कहानी-कविता संग्रह नवम्बर 30, 2021 0 पठन सूची में जोड़ें किस्सा 9 ल लल लssss गाते हुई आई मुनिया… मैं - अरे वाह, आज क्या गुनगुना रही हो मुनिया - जब मैं गाते हुए आऊँगी न, तो मेरे हाथ में वांड (छड़ी) होगी और आप फेयरी (परी) बन जाओगी ?!?!?! मैं - प र स्टिक (छड़ी) तो परी के हाथ में होती है, जैसे तुम्हारे हाथ में है मुनिया - मैं तो हूँ ही फेयरी…पर आप हमेशा काम करती रहती हो, अब जब मैं गाऊँगी न तो आप भी फेयरी बन जाओगी…और वांड घुमाते ही आपके सारे काम हो जाएँगे.. हाय री मेरी प्यारी मुनिया…. (क्रमशः)