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'अ लाइफ़ ऑफ़ वूमन इन इंडिया' श्रृंखला से कहानी वाराणसी से प्रकाशित 'सच की दस्तक' के अक्टूबर 2021

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  'अ लाइफ़ ऑफ़ वूमन इन इंडिया' श्रृंखला से कहानी, वाराणसी से प्रकाशित 'सच की दस्तक' के अक्टूबर 2021 के अंक में... वियोग श्रृंगार स्वरांगी साने प्रिया आदतन अपनी दुपहिया पर रेज रफ़्तार जा रही थी। उसका मोबाइल बज उठा, इयर फ़ोन कान में डले थे, उसने ‘हैलो’ कह दिया। - हैलो प्रिया - जी - मैं मिसेस शास्त्री तुम पढ़ती थी न हमारे स्कूल में, पहचाना! - जी मैडम, नमस्ते, क्यों नहीं पहचानूँगी, कैसी हैं आप? - मैं तो ठीक हूँ पर विद्या मैडम तुम्हें बहुत याद कर रही है, समय मिल सके तो उनसे मिल लो, वे अस्पताल में है और आखिरी घड़ियाँ गिन रही हैं। - क्या, कैसे, कब? ऐसा कहते हुए प्रिया ने दुपहिया साइड में लेकर रोक दी, अब वो चलती गाड़ी पर बात करने की स्थिति में नहीं थी। - उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, सालों पहले, ब्रेस्ट निकाल दिया था लेकिन अब दूसरे ब्रेस्ट में भी हो गया और अब तो आखिरी स्टेज है। आखिरी कुछ दिन बचे हैं उनके पास, वे तुम्हें बहुत याद करती है, अस्पताल का पता मैसेज कर रही हूँ। मिल आओ उनसे। --- प्रिया को दो महीने पहले का वो दिन याद आया जब उसके पुराने स्कूल में उसे भाषण प्रतियोगिता के निर्णा...
 https://www.atarman.com/hi/post/life-me-pause-button एक पॉज़ का बटन ले आइए 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star  Swaraangi Sane   जीवन शैली    अक्टूबर 29, 2021      0    45  पठन सूची में जोड़ें कई बार हमें लगता है हमारे साथ सही समय पर कुछ भी सही नहीं होता लेकिन तब हम यह नहीं सोच पाते कि सही समय तय करने वाले हम कौन होते हैं? इस पूरी दुनिया में  यदि खुद का अस्तित्व तलाशने जाएँगे तो देखेंगे एक परमाणु के एक दशांश इतनी भी हमारी बिसात नहीं लेकिन हमें लगता है हम ही सर्वेसर्वा हैं । जब हमारा अस्तित्व इतना नगण्य है तो हम कैसे तय कर सकते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत! लघुतम पुर्जा एक परिचित ने एक किस्सा बताया था कि हिंदुस्तान के बाहर जब सारी दुनिया के लोग आपस में मिलते हैं तो चीन के लोग चीन की बात करते हैं, जापान के जापानी संस्कृति की,  लेकिन भारत के लोग अपने देश की बात नहीं करते, वे अमेरिका और जर्मनी और चीन और जापान की बात करते हैं।  उन परिचित से उनके विदेशी मित्र ने पूछ ही लिया कि आप भारतीय आपस में मिलते हैं...

तर्क की पराकाष्ठा पर आकलन

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  https://www.jansatta.com/ duniya-mere-aage/assessment- on-the-climax-of-logic/ 1890722/lite/ तर्क की पराकाष्ठा पर आकलन स्वरांगी साने जीवन में जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने का समय आता है, बहुत ज़रूरी होता है कि हम तर्क की पराकाष्ठा पर उसका आकलन करें, न कि भावनाओं में बहकर कोई भी निर्णय लें। अपने विचारों पर डटे रहना अच्छा माना जाता है लेकिन कई बार आपको कुछ लचीला भी बनना चाहिए, ताकि आप दूसरों की गलतियों से सीख ले सकें। कई बार हम भावनाओं को इतनी अधिक प्राथमिकता दे देते हैं कि भले-बुरे की समझ खो बैठते हैं। भावनाओं में कमज़ोर मत पड़िए, बल्कि खुद को सशक्त कीजिए। अपने आपसे सवाल पूछिए और चिंतन-मनन की प्रक्रिया अपनाइए। पीड़ाओं के जंजाल से खुद को निकालिए। आप जो भी बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं, उसे कहकर खुद को मुक्त कीजिए। जब आप सच जान लेंगे तो कोई आपको मूर्ख नहीं बना पाएगा। अपनी निर्णायक क्षमता को पहचानिए। लचीले बने रहने से आप दूसरों की ग़लतियों से सीख पाएँगे। लोगों से मिलते हुए अपने ज़ेहन में हमेशा रखिए कि किसी व्यक्ति से आप क्या सीख सकते हैं! अपनी परिकल्पनाओं को क्रियान्वित करते हुए अपन...

मुनिया की दुनिया किस्सा 4

 https://www.atarman.com/hi/post/muniya-ki-duniya-kissa-4 मुनिया की दुनिया 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star  पठन सूची में जोड़ें किस्सा 4 मुनिया इस साल प्ले ग्रुप में जाने वाली है न। उस दिन उससे यूँ ही पूछा अंग्रेजी की वर्णमाला के बारे में।  उसने पहचाना A.. मैं खुश हो गई अब आगे…तो उसने सीधे V अक्षर पहचाना, उसका उच्चारण भी उसे नहीं पता..उसे केवल इतना पता है कि यह वह अक्षर है जिससे उसके बाबा (पिताजी) का नाम शुरू होता है। इतना बता कर उसने अपनी बैठकी उठा ली। मैंने कहा अरे पढ़ तो…पर वह अपनी ही मस्ती में मगन थी, जिसमें एक भाव था कि उसकी दुनिया में उसके पिता के नाम का अक्षर है… मतलब पिता है, बाकी दुनिया से क्या! वह तो ठाठ से उठी और कंधे उचका कर चल पड़ी.. (क्रमशः)

https://youtu.be/YQGN2Vy-92w

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https://www.youtube.com/watch?v=1OgR3oW4qeI

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ये छोटा-सा नज़राना...

 https://www.atarman.com/hi/post/are-gifts-necessary-to-express-ones-emotions ये छोटा-सा नज़राना... 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star  Swaraangi Sane   जीवन शैली    अक्टूबर 22, 2021      0      पठन सूची में जोड़ें ‘बता दूँ क्या लाना, तुम लौट के आ जाना, ये छोटा-सा नज़राना, पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे’  गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी के शब्दों और लता मंगेशकर की आवाज़ में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया ‘पत्थर के सनम’ फ़िल्म (1967) का यह गीत किसी समय बहुत बजता और सुना-पसंद किया जाता था। किसी पत्थरदिल सनम के लिए गाया यह गीत क्या केवल प्रेमी-प्रेमिका की बात भर है? यदि इसे विस्तार दें तो यह गीत हर रिश्ते पर लागू होता है। गिफ़्ट और रिटर्न गिफ़्ट महँगे गिफ़्ट देना और लंच या डिनर पर मिलना मतलब बिज़नेस मीटिंग करना, कॉरपोरेट जगत् का चलन है। जाने कैसे यह चलन हमारे घरों तक आ गया। बच्चों की बर्थ-डे पार्टियों से होता हुआ यह शगूफ़ा महानगरों से छोटे कस्बों तक पहुँच गया।  अब हर मुलाकात गिफ़्ट लेने-देने की प्रथा बन गई है। क...