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कला वसुधा लखनऊ के नवीनतम् अंक में...

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  विरासत की गगरी और फिसलन वाली ऊँची चढ़ाई नृत्य गुरू सविता गोडबोले को याद करते हुए...   (जन्म 8 जनवरी 1952, मृत्यु 4 सितंबर 2021) स्वरांगी साने पुराने बाड़ों को याद कीजिए, उनमें प्रवेश के दो दरवाज़े होते थे, एक आगे का जो सीधे बैठक में खुलता और दूसरा पीछे का, जो मुख्य घर में प्रवेश करा देता। आगे का दरवाज़ा भले ही बंद रहे लेकिन पीछे का दरवाज़ा हमेशा खुला होता था। उन दिनों का चलन भी कुछ ऐसा था कि लोग खुद ही अपनी सीमा जान लिया करते थे और उन्हें लाँघा भी नहीं करते थे। औपचारिक लोग आगे के दरवाज़े से बाकायदा दरवाज़े की साँकल, कुंडी या बैल बजाकर आते और अनौपचारिक रिश्तों के लिए पिछला दरवाज़ा अलसुबह से देर रात तक हमेशा खुला रहता। मध्यप्रदेश के शहर इंदौर के मध्य में स्थित आड़ा बाज़ार इलाके में ऐसा ही एक केलकरों का बाड़ा था। उसका अगला हिस्सा आड़े बाज़ार में खुलता और पिछला हिस्सा बड़ा रावला इलाके में। अगले हिस्से में नीचे साँगली के डॉक्टर उदय गोडबोले अपनी प्रैक्टिस करते और ऊपर सविता गोडबोले और उनकी शिष्याएँ नृत्य की प्रैक्टिस करती थीं। खास शिष्याओं के लिए पिछला दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था। ऐसे ह...

किस्सा 15

 https://www.atarman.com/hi/post/muniya-ki-duniya-kissa-15 मुनिया की दुनिया 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star 5 RATING, 1 REVIEWS  Swaraangi Sane   कहानी-कविता संग्रह    फ़रवरी 22, 2022      0     पठन सूची में जोड़ें किस्सा 15 दरवाज़ा बजा। मैं समझ गई कि घंटी तक हाथ न पहुँच पाने वाली यह मुनिया की ही आमद है। मुनिया ने उधर से कहा- ‘ डकी (डक-बत्तख) आया है’ । मैंने दरवाज़ा खोलते हुए ‘क्वैक-क्वैक’ (बत्तख की आवाज़) किया। मुनिया एकदम ख़ुश हो गई। मुनिया ऐसे ही कई नाम धरती है। कभी कहती है कि वह ‘सिंड्रेला’ है। कभी खुद को ‘सॉफ़्टी’ कहलवाती है..और जिस दिन वह ‘सॉफ़्टी’ होती है, उस पूरे दिन उसे कोई डाँट नहीं सकता, ऐसा उसका ख़ुद का फ़रमान है। फ़िर जिस दिन वह ‘डकी’ होती है उस दिन भी नहीं, और ‘सिंड्रेला’ होने पर तो बिल्कुल नहीं। भई हमें तो बचपन में साल का एक ही दिन पता था-जन्मदिन..जिस दिन डाँट खाने से राहत मिलने की कुछ संभावना होती थी । पर हमारी मुनिया तो सयानी है, इस तरह हर दिन कोई नया स्वाँग रच अपने लाड़ लड़वा लेती है। (क्रमशः) मुनिया की ...

डाकिया डाक लाया

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फिर वही ‘ढाक के तीन पात’

 https://www.atarman.com/hi/post/dh-se-shabd-in-hindi फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star  Swaraangi Sane   भाषा    फ़रवरी 1, 2022      0    24  पठन सूची में जोड़ें कुछ वर्णों की अपनी पहचान होती है वैसा ही एक वर्ण है ‘ढ’। किसी को केवल  ‘ढ’ कहने भर से कोई कितना भी ‘ढ’ हो तब भी इतना समझ लेता है कि उसे ‘ढ’ से ढोर कहा जा रहा है या ढप्पू या उसे ‘ढ’ ढक्कन का या ‘ढ’ ढपोरशंख कहा जा रहा है । वह इसे नासमझने का ढोंग नहीं कर सकता। ‘अपनी अपनी ढपली पर अपना अपना राग गाने’ का ढाँचा इसी ‘ढ’ का बनाया हुआ है। यह ढाँचा इस तरह बना है कि जैसा चाहे ढल जाए और ज़रा ढील दी तो माटी के ढेले की तरह लुढ़क जाएगा। ‘ढाई आखर’ ‘ढ’ हिंदी वर्णमाला का चौदहवाँ व्ंयजन है और ट वर्ग का चौथा वर्ण। यह मूर्धन्य, स्पर्श,घोष और महाप्राण ध्वनि है लेकिन ‘ढाई आखर’ पढ़ने वालों को यह अर्धाली में ही ‘ढ’ और ‘ढ़’ का अंतर समझाकर ढाढ़स बढ़ाता है । इसे पढ़कर वह बढ़ जाता है और इसके गाढ़े रंग से गढ़ जाता है। ढाबे पर कढ़ाई में डालने पर उसके आकार में ढल जात...

किस्सा 13 मुनिया की दुनिया

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 https://www.atarman.com/hi/post/muniya-ki-duniya-kissa-13 मुनिया की दुनिया 5 stars 4 stars 3 stars 2 stars 1 star  Swaraangi Sane   कहानी-कविता संग्रह    फ़रवरी 1, 2022      0     पठन सूची में जोड़ें किस्सा 13 यूँ तो दरवाज़ा खुला था पर  वह एक हाथ से दरवाज़ा बजा रही थी..लगातार..थाप पर थाप…और उसी लय में अपना एक पैर हिला रही थी और दूसरा हाथ हवा में लहरा रही थी मैं और बेटी दरवाज़े के पास आकर खड़े हो गए पर मुनिया की सिम्फनी जारी थी..अपनी ही धुन में मगन ..कुछ देर बाद उसका ध्यान गया कि अरे हम तो दरवाज़े पर ही खड़े हैं और वह बेसाख्ता हँसने लगी… हम माँ-बेटी भी अपनी हँसी रोक नहीं पाए...हमारी समवेत खिलखिलाहट की गूँज से अड़ोस-पड़ोस के बंद दरवाज़े भी खुल गए, कि  ‘आखिर क्या हुआ?’ ..अरे वाह मुनिया, तुमने तो सिद्ध कर दिया कि  आज भी हँसी में बंद दरवाज़ों को खुलवाने की ताकत है। (क्रमशः) टैग मुनिया की दुनिया   हिंदी कहानी   प्रेरक कहानियाँ   मुनिया की दुनिया का किस्सा   हिंदी स्टोरीज   मुनिया की मासूम दुनि...