'अ लाइफ़ ऑफ़ वूमन इन इंडिया' श्रृंखला से कहानी वाराणसी से प्रकाशित 'सच की दस्तक' के अक्टूबर 2021
'अ लाइफ़ ऑफ़ वूमन इन इंडिया' श्रृंखला से कहानी, वाराणसी से प्रकाशित 'सच की दस्तक' के अक्टूबर 2021 के अंक में...
वियोग श्रृंगार
स्वरांगी साने
प्रिया आदतन अपनी दुपहिया पर रेज रफ़्तार जा रही थी। उसका मोबाइल बज उठा, इयर फ़ोन कान में डले थे, उसने ‘हैलो’ कह दिया।
- हैलो प्रिया
- जी
- मैं मिसेस शास्त्री तुम पढ़ती थी न हमारे स्कूल में, पहचाना!
- जी मैडम, नमस्ते, क्यों नहीं पहचानूँगी, कैसी हैं आप?
- मैं तो ठीक हूँ पर विद्या मैडम तुम्हें बहुत याद कर रही है, समय मिल सके तो उनसे मिल लो, वे अस्पताल में है और आखिरी घड़ियाँ गिन रही हैं।
- क्या, कैसे, कब? ऐसा कहते हुए प्रिया ने दुपहिया साइड में लेकर रोक दी, अब वो चलती गाड़ी पर बात करने की स्थिति में नहीं थी।
- उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, सालों पहले, ब्रेस्ट निकाल दिया था लेकिन अब दूसरे ब्रेस्ट में भी हो गया और अब तो आखिरी स्टेज है। आखिरी कुछ दिन बचे हैं उनके पास, वे तुम्हें बहुत याद करती है, अस्पताल का पता मैसेज कर रही हूँ। मिल आओ उनसे।
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प्रिया को दो महीने पहले का वो दिन याद आया जब उसके पुराने स्कूल में उसे भाषण प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में बुलाया गया था। कितनी ख़ुश थी वो, जिस स्कूल में वो पढ़ी थी, जहाँ उसने सैकड़ों बार भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया था, वहाँ आज जज बनकर जा रही थी। जब उसका परिचय पढ़ा जा रहा था तब विद्या मैडम की आँखों में भी कितनी खुशी झलक रही थी और दो महीनों में ये क्या हो गया? मैसेज आ चुका था। प्रिया पत्रकारिता करती थी, दिनभर शहर की गलियों में घूमा करती, उसके तुरंत ध्यान आ गया कि अस्पताल कहाँ है। वह किसी स्टोरी के सिलसिले में निकली थी लेकिन अब मैडम से मिले बिना उसे चैन नहीं था। वह अस्पताल के आईसीयू के बाहर थी। यह आंगतुकों के मिलने का समय नहीं था। प्रिया ने अपना प्रेस का कार्ड दिखा दिया। प्रेस की वजह से मिलने वाले लाभ, छूट वह कभी नहीं चाहती थी लेकिन उसे लग रहा था अभी नहीं तो शायद वह कभी नहीं।
वह आईसीयू में थी, विद्या मैडम बहुत दुबली लग रही थी, इतनी कि पलंग और उनकी देह में अंतर तक करना मुश्किल हो रहा था। वे नीम बेहोशी में थी। सिस्टर ने बताया शायद सो रही है। प्रिया उनके पास बैठ गई, उनके हाथ पर धीरे-से अपना हाथ रख दिया। विद्या मैडम ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं और मिचमिचाती आँखों से प्रिया को देख हलके से मुस्कुरा दी। प्रिया ने इतना ही कहा- मैडम।
और चुप हो गई। मैडम उसे देख रही थी, जैसे हमेशा देखा करती थीं, स्नेह और गर्व के मिश्रित भाव के साथ। प्रिया की आँखों के सामने स्कूल का परिसर, गलियारा और उनकी कक्षा दिख गई। कक्षा के बाहर ही तख्ती लगी थी- कक्षा नवीं ‘अ’।
आठवीं तक वह छोटे स्कूल में पढ़ती थी, किसी बड़े स्कूल में पढ़ने का यह उसका पहला अवसर था। कितने सारे विद्यार्थी थे, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, कहाँ जाए, क्या करें, किसी ने बताया नए छात्रों की लिस्ट वहाँ लगी है, जाकर देख ले उसका नाम किस वर्ग में है। उसने नोटिस बोर्ड पर देखा और फिर संकेत बोर्डों के सहारे अपनी कक्षा में पहुँच गई। वहाँ सब लोग नए थे। पहली पंक्ति में ही एक जगह खाली थी, उसने पूछा – यहाँ कोई बैठेगा? नहीं जवाब सुनने पर उसने अपना बैगसेक वहाँ रख दिया। असेंबली हुई और उसके बाद कक्षा प्रारंभ हुई। पहला विषय हिंदी था और हिंदी की शिक्षिका ही उनकी कक्षाध्यापिका थीं। वे कक्षा में आईं। उपस्थिति ली गई और पहला पाठ मीरा का पद था। मीराबाई के जीवन परिचय के बाद, शब्दार्थ, उनका पद और उसका भावार्थ समझाया गया। विद्या मैडम ने पूछ लिया- सबको ठीक से समझ आ गया, किसी के मन में कोई सवाल?
प्रिया ने हाथ खड़ा कर दिया।
- हाँ पूछो
- मैडम मीरा का पति था तब भी वह कहती है मेरे तो गिरधर गोपाल, उसका ऐसा कहना सही है या ग़लत?
उसके इस प्रश्न पर सारी कक्षा हँस पड़ी कि कैसा बेहूदा सवाल किया। मैडम भी चौंक पड़ी और बोल उठी- प्यार में कुछ सही या ग़लत नहीं होता।
लेकिन अपने इस जवाब के बाद वे दूसरी बार चौंक गई कि पूरी कक्षा के सामने उन्होंने ऐसा कैसा जवाब दे दिया। बात सँभालते हुए उन्होंने कहा- कल इस पाठ के प्रश्नोत्तर करेंगे, घर से पढ़कर आना, और तुम विद्या रिसेस में मुझसे आकर मिलो।
पूरी कक्षा को लगा पहले ही दिन इसकी खिंचाई होगी। प्रिया के मन में कोई भाव नहीं था, न डर, न आशंका, न कौतूहल, न प्रसन्नता। अगले दो कालखंडों के बाद पहली छोटी छुट्टी हुई और उसके बाद के दो कालखंडों के बाद लंच ब्रेक। प्रिया ने अपना टिफ़िन ख़त्म किया और टीचर्स रूम के बाहर थी। वहाँ चपरासी ने पूछा- क्या काम है?
- विद्या मैम ने बुलाया है।
- ठीक है रुको। थोड़ी देर बाद वो वापिस आया और उसने कहा- मैडमजी ने अंदर बुलाया है।
- मे आई कम इन मैम
- हाँ, हाँ आओ
- जी आपने बुलाया था।
- आ जाओ, बाहर लॉन में चलते हैं।
प्रिया कुछ समझ नहीं पाई लेकिन उनके साथ लॉन में चली गई। ग्राउंड पर कई छात्र-छात्राएँ थीं, झूले लगे बगीचे में भी स्टुडेंट्स थे लेकिन लॉन की तरफ़ कोई नहीं था। विद्या मैडम ने पूछा – स्कूल में नई आई हो, बताओ क्या सवाल था?
- जी कुछ नहीं, मीरा सही थी या ग़लत ऐसा सवाल आया?
- लेकिन तुम्हारे दिमाग में ऐसा सवाल आया ही क्यों?
- सीता, रावण के यहाँ थी तो राम ने वनवास भेज दिया था, फिर मीरा का पति तो सामान्य इंसान था और मीरा को कोई उठाकर नहीं ले गया था, कृष्ण उसका अपना चुनाव था। शादी के बाद दूसरे व्यक्ति के यहाँ रहना भी गुनाह हो, तो किसी और की कल्पना क्या उससे बड़ा अपराध नहीं।
- स्वार्थ से निहीत कुछ भी इच्छा हो तो वह ग़लत है, अपराध है। न सीता ने कोई पाप किया था, न मीरा ने। सारे बड़े दार्शनिक कहकर गए हैं, प्रेम करो लेकिन यदि कोई स्त्री किसी पुरुष से प्रेम कर ले तो हम उसे अपराधी कह देते हैं।
- जी, मैंने पढ़ा था सुकरात पर तो युवाओं को भ्रष्ट करने का आरोप लग गया था क्योंकि उन्होंने प्यार की बात कही, उन्हें ज़हर दे दिया, मीरा को ज़हर दे दिया, तो क्या प्यार करना ज़हर पीना है।
- तुमने कक्षा में पहला सवाल किया तभी समझ गई कि तुम पढ़ती भी हो और समझती भी हो। अब इस भेद को समझो। उन्होंने प्यार किया लेकिन ज़हर उन्होंने खुद नहीं पिया, उन्हें पिलाया गया और वो भी उन्होंने हँसते-हँसते पी लिया। उन्होंने प्यार का अमृत चख लिया था इसलिए उन्हें वह विष लगा ही नहीं।
- क्या प्यार में इतनी ताकत होती है?
- हाँ प्यार में बहुत ताकत होती है, लेकिन तुम जिस उम्र में हो, उस उम्र का प्यार केवल आकर्षण होता है। फ़िल्में देखकर परवान चढ़ता है और तुम्हारी उम्र में ग़लतियाँ हो जाती है। प्यार और आकर्षण को अलग करके समझना, कभी भी प्यार करो तो।
- पर बिना आकर्षण प्यार कैसे होगा? आपको कुछ आकर्षित करता है, तभी आप उसे पसंद करते हैं और पसंद करते हैं तभी प्यार भी कर सकते है।
- हाँ, देख लो, तुम खुद ही कह भी रही हो, समझ भी रही हो, केवल आकर्षण होगा तो वह क्षणिक होगा। प्यार की भट्टी निरंतर धधकती है, उसकी आँच कम नहीं होती। वह सोने को तपाकर कुंदन बना देती है।
- सच्ची
- हाँ सच्ची, बड़ी हो जाओगी तो तुम खुद समझ जाओगी। अभी पढ़ाई पर ध्यान दो। लिखो, पढ़ो, भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लिया है कभी, ले सकती हो।
- जी पहले के स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी।
- तभी, हर विषय के दोनों पहलुओं को समझ सकती हो। यहाँ भी लो, विजयी भव।
प्रिया ने गर्दन झुका ली, जाने उसे क्या लगा, उसने मैडम के पैर छू लिए, मैडम ने उसे उठाकर, उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
आज आईसीयू में प्रिया उसी हाथ को पकड़े बैठी थी। वो हाथ छूटने वाला था। प्रिया संयत नहीं हो पा रही थी। विद्या मैडम के साथ की कितनी ही घटनाएँ उसकी आँखों के सामने किसी रील की तरह चल रही थी। उस दिन तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में जाना था। स्कूल के समय में कोई प्रतियोगिता होती तब भी विद्या मैडम उसके साथ जाती थी और प्रतियोगिता के बाद साथ में स्कूल लेकर आती थी। इस प्रतियोगिता का समय स्कूल छूटने के बाद का था। विद्या मैडम ने कहा घर पर बता देना, तुम लेट आओगी। प्रिया ने हाँ कह दिया। वह तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता थी। हर प्रतियोगी को दो मिनट सोचने के लिए तीन मिनट बोलने के लिए दिए जा रहे थे। प्रतिद्वंदियों को अलग-अलग विषय दिए जा रहे थे, अगर मैं प्रधानमंत्री होता..अगर मैं पक्षी होता, हमारा विद्यालय, मेरा प्रिय त्योहार और प्रिया की बारी आई। उसे विषय मिला झाड़ू। प्रिया ने दो मिनट सोचा और बोलने लगी- झाड़ू हमें एकता का पाठ पढ़ाती है। छोटी-छोटी कई सींकों से बनी झाड़ू कहती है कि एकजुट रहे तो बड़ी से बड़ी गंदगी हटा सकते हैं। हमारे देश में अज्ञान, भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी समस्याओं को हम सभी इसी तरह एकजूट होकर हटा सकते हैं। साने गुरुजी स्वयं झाड़ू लगाते थे और वे कहते थे कि जो भी काम करो, वो इस तरह करो कि इससे और कोई अधिक श्रेष्ठ तरीका हो ही नहीं सकता। तालियों पर तालियाँ बजने लगी। उसने विद्या मैडम की ओर देखा, मैडम ने कमाल हो का इशारा किया। ज़ाहिरन उसे पहला पुरस्कार मिला था। विद्या मैडम उसके पास आ गई और उसे गले से लगा लिया- तुमने तो कमाल कर दिया, देखा जाए तो तुम्हें सबसे कठिन विषय मिला था पर लगा जैसे तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं। यहाँ से मेरा घर पास ही है, चलो तुम्हें अपने घर ले चलती हूँ।
- मैडम मुझे घर जाने में देर हो जाएगी।
- थोड़ी देर तो चलो, घर तो देख लो।
प्रिया मान गई। रिक्शा में मैडम और प्रिया थी। मैडम ने बीच में रिक्शा रुकवाई और समोसे पैक करवा लिए, कहा- भूख लग रही होगी न।
प्रिया कुछ कह नहीं पाई। वे घर पहुँचे। मैडम का घर दो मंजिला था, ऊपर वे रहती थी। घर का ताला खोलते हुए उन्होंने कहा- यहाँ मैं अकेले रहती हूँ। भाई का परिवार और माँ नीचे रहती हैं।
- अच्छा
- तुमने मेरे परिवार के बारे में नहीं पूछा, लोग पूछते हैं।
प्रिया क्या पूछती, उसने कुछ नहीं कहा। मैडम दो प्लेट में दोनों के लिए समोसे डालकर ले आई और कहा लो तब तक चाय बनाती हूँ। चाय तो पीती हो न?
- जी, पर आप कहे तो मैं बना दूँ।
- नहीं तुम बैठो, मैं चाय उबालने रख आई, समोसे खाने तक बन जाएगी।
मैडम कहने लगी- हम बड़े आदर्शों को केवल देखते हैं लेकिन उन्हें अमल में नहीं लाते। जो मीरा कर सकती हैं, जो सीता कर सकती हैं वो करने का साहस हममें नहीं होता इसलिए हमें कभी कोई कृष्ण, कोई राम नहीं मिलता। अपने लक्ष्य को पाने के लिए साहस तो करना होगा न। जैसे इस साल तुम्हारा दसवीं का वर्ष है तो तुम्हें डटकर पढ़ना है और उस पढ़ाई में से तुम भाषण प्रतियोगिताओं के लिए समय निकालने का साहस करती हो, तभी तुम्हें फल मिलता है। बाकी छात्र-छात्राएँ सोचते हैं पढ़ाई के साल में केवल पढ़ाई ही करनी चाहिए लेकिन तुम्हारी ताकत ये प्रतियोगिताएँ, इनके लिए की गई मेहनत और इनमें मिलने वाला श्रेय है। यह तुम्हें दुगुनी ऊर्जा देता है काम करने की। सोचो प्यार इससे कहीं अधिक गहरा, ऊँचा है, वह कितना बल देता होगा।
प्रिया को कुछ समझ में आया, कुछ नहीं। वह वहाँ से लौट पड़ी।
और फिर सालों बाद उस दिन भाषण प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में गई तो विद्या मैडम से मिली थी। प्रतियोगिता के बाद उन्होंने कहा था घर चलोगी।
प्रिया ने हामी भर दी। प्रिया अपनी गाड़ी पर थी, मैडम रिक्शा में। दोनों उनके घर पहुँची। ताला खुलते ही घर में से दवाइयों की गंध आई। प्रिया ने पूछा- यह गंध कैसी?
- ज़हर का प्याला राणाजी ही नहीं देते, कभी-कभी ज़िंदगी भी ज़हर देती है और वह पीना पड़ता है।
- आप ऐसा क्यों कह रही है?
- प्रिया तुमने एक सवाल पूछा था न उसका जवाब अब तुम समझ पाओ शायद, प्यार में कोई सही या गलत नहीं होता। ज़रूरी नहीं कि आप अपने प्यार से मिलो ही, बिना मिले भी वो आपके साथ होता है। यदि कोई मीरा है तो उसका कृष्ण उससे मिलने आता ही है जिसे कोई देख नहीं सकता केवल उसे मीरा और कृष्ण ही जान सकते हैं। पर मीरा बनना पड़ता है, कष्ट सहने पड़ते हैं। आँसुओं को सहन करना पड़ता है और वियोग का ही श्रृंगार होता है। श्रृंगार रस में वियोग श्रृंगार सब पढ़ते हैं, समझता कोई नहीं।
- क्या आप वियोग में है?
- मैं संयोग में हूँ, मेरे साथ मेरा कृष्ण है, उसे कोई देख नहीं सकता, उसका भार अकेले सहना होता है।
- यह तो अविश्वसनीय है। ‘दो जिस्म मगर एक जान है हम’, प्रिया गुनगुना उठी।
- बिल्कुल और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अगला इंसान हमें चाहता है या नहीं। आप चाहते हो, इतना ही सत्य है और यदि आप किसी को चाहते हो, तो वह भी आपको चाहता है, इतना विश्वास रखो। मुझे एक छात्रा के रूप में तुममें स्पार्क दिखा और तुमने भी उसका प्रतिदान दिया न, बिल्कुल ऐसे ही।
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प्रिया आईसीयू में थी, विद्या मैडम ने याद किया था, इसलिए उस तक वह संदेश पहुँचा था और प्रिया यहाँ थी। विद्या मैडम का मन की गाँठ कैंसर बन गई थी क्या? उनके कृष्ण तक इसकी ख़बर पहुँची भी थी या नहीं।
प्रिया के मन में ग़ालिब का शेर कौंध गया
‘हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको खबर होने तक’।
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