'साहित्य सुषमा' पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित *"साहित्य सुषमा" ई-पत्रिका* का नया तिमाही अंक (जनवरी फर-मार्च2022) इसमें यह कहानी पढ़ सकते हैं - अ लाइफ ऑफ वूमन इन इंडिया सीरीज से दोनों की हँसी


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इसमें यह कहानी पढ़ सकते हैं - अ लाइफ ऑफ वूमन इन इंडिया सीरीज से


दोनों की हँसी

स्वरांगी साने

सुबह का समय था, प्रिया को अपने दो हाथ कम लग रहे थे, रसोई के काम जैसे ख़त्म ही नहीं होते हो...तभी दरवाज़े की घंटी बजी..इस समय कोई क्यों आया इस अनमने भाव से उसने दरवाज़ा खोला। सामने दोनों कंधों पर साड़ी का पल्लू लिये एक महिला और बच्चा खड़ा था। महिला की उम्र ज़्यादा नहीं थी, शायद उसके साथ आने वाला उसका कोई भाई हो...पर ये कौन है, क्यों आई है...जैसे सवाल प्रिया के मन में घूम रहे थे..उतने में वह महिला बोल पड़ी- किसी ने बताया आपको काम वाली बाई की ज़रूरत है।

प्रिया ने हाँ में गर्दन हिलाई लेकिन फिर भी हैरान थी कि यह महिला कौन है, कपड़े वगैरह से तो किसी मध्यम वर्ग की महिला ही लग रही थी। उस महिला ने बताया – मेरा नाम शशिकला है और यह मेरा लड़का है आलोक...आठवीं में पढ़ता है।

प्रिया और भी हैरत में पड़ गई जो खुद बमुश्किल 20-25 साल की लग रही थी, उसका इतना बड़ा बेटा? इसी असमंजस में उसने दरवाज़ा खोला और उस महिला को अंदर बुलाया...कुकर की सीटी बजते ही उसे ध्यान आया कि रसोई अभी भी बिखरी पड़ी है। प्रिया ने उस महिला से पूछा – बताइए क्या काम है?

-    मुझे काम की ज़रूरत है।

-    कैसा काम

-    आपको काम वाली चाहिए न

-    हाँ....

-    मैं करने को तैयार हूँ..यहाँ पिछली गली में ही रहती हूँ। आप जिस समय कहेंगी उस समय आ जाऊँगी, झाड़ू-पोंछा, कपड़े-बर्तन और  खाना भी बना सकती हूँ।

-    अरे तुम सब करोगी तो मैं क्या करूँगी...प्रिया ने थोड़ा सहज होते हुए कहा।

-    आप अपने ऑफ़िस के काम करना

-    तुम भी किसी ऑफ़िस में काम कर सकती हो, कहाँ तक पढ़ी हो?

-    दसवीं तक पढ़ी हूँ कि तभी शादी हो गई। शादी के बाद पढ़ाई बंद हो गई।

-    अब पढ़ लो...अभी भी देर नहीं हुई। प्राइवेट फ़ॉर्म भर सकती हो। किसी दिन शाम को आना, बात करती हूँ....अभी थोड़ा जल्दी में हूँ।

प्रिया के ऐसा कहने पर शशिकला थोड़ी रुआँसी हो गई। उसने कहा, अभी से कर सकती हूँ। काम अभी कर देती हूँ...बातें शाम को कर लेंगे।

प्रिया ने थोड़े असमंजस में ही उसे कह दिया- ठीक है, झाड़ू-पोंछा, बर्तन कर दो अभी, फिर शाम को बात करते हैं।

प्रिया को शशिकला के काम करने का कहने से मन में थोड़ी राहत भी हो रही थी क्योंकि आज वह वैसे भी लेट हो चुकी थी और सोच ही रही थी कि कोई मदद मिल जाती...

प्रिया, शशिकला को काम समझाने लगी, आलोक बाहर के कमरे में बैठा था। उसने आलोक के लिए टीवी पर कार्टून चैनल लगा दिया...आठवीं कक्षा का आलोक कार्टून देखता होगा क्या...एक पल के लिए प्रिया के मन में विचार कौंधा लेकिन उसे अभी बिखरा घर दिख रहा था और वह भीतर चली गई।

शशिकला तब तक रसोईघर झाड़ने लगी थी। प्रिया को भी रसोई समेटनी थी, भोजन पकाने के बर्तन खाली कर शशिकला को माँजने के लिए देने थे। शशिकला काम निपटाकर चली गई।

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उसी दिन शाम के लगभग सात बजे शशिकला आई। इस बार वह अकेली थी। प्रिया ने पूछा- तुम्हारा बेटा नहीं आया?

-    नहीं, वो तो सुबह आपके यहाँ पहली बार आना थी, इसलिए उसे ले आई थी, अब तो आपसे पहचान हो गई

प्रिया को उसकी मासूमियत पर हँसी आ गई। पहचान भी हो गई..अभी तो मिले थे सुबह...प्रिया ने कहा- सही है मुलाकात तो हो गई...पहचान भी हो जाएगी। बताओ इससे पहले कहाँ काम करती थी? 

-    नहीं, आपके यहाँ से ही शुरुआत कर रही हूँ। अब तक घर पर ही थी। बेटा बड़ा हो गया है, अब घर पर ज़्यादा काम भी नहीं रहता, इसलिए सोचा थोड़े पैसे कमा लूँ...बेटे की पढ़ाई के काम आएँगे।

-    यह तो बहुत अच्छी बात है कि तुम ऐसा सोचती हो..पर तुम भी पढ़ो, पढ़ाई करोगी तो कुछ अच्छा काम कर पाओगी, कुछ ज़्यादा कमा पाओगी...

-    लेकिन मैं घर से दूर नहीं जा सकती। पति के आने से पहले काम निपटाकर घर पहुँच जाऊँ, ऐसे काम करना है...उन्हें पता नहीं चलना चाहिए। वे करने नहीं देंगे। कहते हैं, मैं कमाता हूँ तुझे क्या चिंता, पर मुझे अपना खुद का कमाना है।

-    हाँ अपने पैरों पर तो खड़ा होना ही चाहिए। आर्थिक आत्मनिर्भरता बड़ी ताकत होती है।

प्रिया ने शशिकला को काम करने की हामी दे दी।

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शशिकला काम पर आने लगी और धीरे-धीरे दोनों में बातें होने लगीं। शशिकला अब प्रिया से खुलने लगी थी। वो पहले मैडम कहती थी, अब ताई (दीदी) कहने लगी।

-    ताई आपकी शादी कैसे हुई?

-    कैसे मतलब? जैसी सबकी होती है, तुम्हारी कैसी हुई?

-    मेरे सामने कोई चुनाव ही नहीं था..घर वालों ने तय कर दिया...इससे शादी करनी है....फिर हमें दो मिनट अकेले में बात करने के लिए कहा। उन्होंने मेरा नाम पूछा..मैंने गर्दन झुकाकर धीरे से नाम बता दिया...हो गई बात और हो गई शादी।

शशिकला निश्छल हँसी हँस दी, प्रिया भी हँस पड़ी, लेकिन दोनों की हँसी में वो हँसी नहीं थी, जिसे हँसी कह पाते...

इसी तरह शशिकला रोज़ आने लगी, काम करके जाने लगी...एक दिन उसने बोला- मुझे भी पंजाबी ड्रेस (सलवार-सूट) पहननी है। प्रिया ने कहा- तो दिक्कत क्या है?

-    मेरे पास नहीं है।

-    अरे मेरी ले लो, जो चाहिए।

-    साड़ी में बहुत बंधन लगता है, साड़ी पहनना ही संस्कारी होना होता है क्या?

-    संस्कारों का कपड़ों से संबंध नहीं होता, कपड़े तो शरीर ढकने के लिए होते हैं, जो पहनना चाहो, जिसमें सहज महसूस करो, वो पहनो।

-    मेरे लिए तो साड़ी के बंधन से निकलना भी एक तरह की आज़ादी है। क्या पहनना है, इतना तो तय कर सकूँ।

-    क्या तुम इतना भी तय नहीं कर सकती?

-    नहीं, हमारे यहाँ सब आलोक के पापा तय करते हैं। लई डेंजर इंसान हैं।

-    तुम्हें कैसे पता डेंजर हैं?

-    बहुत जल्दी नाराज़ हो जाते हैं, रोटी ठंडी हो जाए तो नाराज़, सब्जी में नमक कम हो तो नाराज़...हाथ भी उठा देते हैं।

-    तुम सहन क्यों करती हो?

-    डेंजर है न बहुत

-    अरे फिर वही। मैं तुम्हें कैसी लगती हूँ?

-    आप तो बहुत अच्छी हो।

-    अच्छी कैसे हूँ..तुम मेरे यहाँ खाना नहीं बनाती, इसलिए मैं नाराज़ नहीं होती..लेकिन हो सकता है, मैं भी डेंजर हो जाऊँ!

-    नहीं, नहीं आप ऐसा नहीं करेंगी!

-    यह तुम्हारे मन में मेरी छवि बन गई है। हम अपने मन में छवि बनाते हैं कि सामने वाला ऐसा है। तुम अपने पति को बता दो कि मैं बहुत डेंजर हूँ। वह भी मान लेगा।

-    सच्ची! क्या वो ऐसा मान लेगा।

-    हाँ,सब हमारे मन का खेल है। तुम अपने पति से डरना बंद करो, तो वह भी डराना बंद कर देगा। तुम डरती हो, इसलिए वो डराता है।

-    तो क्या मैं सलवार सूट पहन सकती हूँ?

प्रिया ने कोई जवाब नहीं दिया....वह उठी और अलमारी में से अपने कुछ सलवार सूट निकालकर शशिकला को दे दिये और कहा कि कल से इन्हें पहनकर आना। पति को मेरा नाम बता देना....कहना मैंने कहा है।

-    पर उन्हें तो यह भी नहीं पता कि मैं काम पर आती हूँ। वह झाड़ू-पोंछा नहीं करने देंगे।

-    तो दूसरा काम बता दो, कहना मेरे घर खाना बनाने आती हो। लेकिन पति को बताओ कि तुम कमा रही हो...तुम कमा सकती हो..इससे तुम्हारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

शशिकला इस पर कुछ बोली नहीं....केवल मुंडी हिला दी और चली गई।

प्रिया भी अपने कामों में लग गई। पहले दिन के बाद दूसरा दिन आया...दूसरी शशिकला भी आई। शशिकला ने प्रिया का दिया सलवार सूट पहना था...वह अपनी आज़ादी की राह पर चल पड़ी थी....

 

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