अमृतसर, पंजाब से निकलने वाली पत्रिका साहित्यिक एकम के अक्टूबर 2021 के अंक में कुछ कविताएँ
अमृतसर, पंजाब से निकलने वाली पत्रिका साहित्यिक एकम के अक्टूबर 2021 के अंक में कुछ कविताएँ
टूटने और जुड़ने के बीच
स्वरांगी साने
मैं झुकती रही
टूटती रही रोती रही
थी मैं लड़की
इसलिए लगातार हारती रही
मैं जीतने के लिए पैदा हुई थी
मुझे हार के लिए तैयार किया जाता रहा
जीना और जीतना चाहती थी मैं भी
पर मुझे लड़की की तरह बड़ा किया गया
मेरी परवरिश ही वैसी थी
मैं जीती रही उम्र भर
टूटने और जुड़ने के ही बीच
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पिता
स्वरांगी साने
तुमने कहा था आदमी फिर लौटता है
तुम कहाँ गए
तुम यहाँ होते तो कितना अच्छा होता
मै तुम्हें देखती
तुमसे सदियों की बातें करती
पर तुम काल से परे कहाँ चले गए
जो है मेरे पास तुम्हारा
उसे बताना संभव नहीं
और जो नहीं रहा
उसके बारे में
शब्द नहीं हैं मेरे पास
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शह और मात
स्वरांगी साने
तुमने
जारी किया फ़रमान
कि बचे हैं उसके पास
दिन केवल चार।
पहले दिन
वह घबराई बहुत ज़्यादा
थर्रा गई
जैसे उसके भीतर हो
हिरोशिमा।
दूसरे दिन
उसने याद किए वे सारे दिन
जो थे स्ट्राबेरी की तरह
जो हुए नाशपति की तरह
और फिर बदल गए थे
करेले में।
तीसरे दिन
लगा जैसे दौड़ रहा हो
कोई निरीह हिरन
एक तीर और वह
इतना ही सच था।
चौथे दिन
उसे फैसला करना था
कभी उसके मन में आया
स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी
कभी सुंदर ताजमहल
तो कभी चीन की लंबी दीवार
खींच गई उसके भीतर,
कभी उसके भीतर
समा गए सातों समंदर
तो कभी वह दोनों ध्रुवों की तरह
हो गई ठंडी और सख़्त।
तुमने चेताया
यह शह
और यह लो मात !
तुमने दे दी सज़ा पर
मुक्त हो गई वह
तुम्हारी बिसात से !
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