लोकमत समाचार के दिवाली अंक 2021 में कहानी लॉफिंग बुद्धा


 

लाफ़िंग बुद्धा

स्वरांगी साने

प्रिया के यहाँ फ़नीर्चर बनाने का काम चल रहा था। भावना ने संदर्भ दिया था। घर का मुख्य दरवाज़ा खुला ही था, बढ़ई-मिस्त्री दस बार भीतर-बाहर करते थे। ठक-ठक, खट-खट की आवाज़ें हो रही थीं। उनका घर जिस मोहल्ले में था वहाँ अभी भी पॉश कॉलोनी के संस्कार नहीं आए थे और आते-जाते लोग झाँककर देख जाते थे कि क्या काम चल रहा है, कहाँ तक हुआ है...प्रिया भी ‘आओ-जाओ घर तुम्हारा’ के बेफ़िक्री के भाव में रहती..कितनी बार वह अंदर के कमरे में ही रहती और बाहर कौन आकर देख गया, उसे पता ही नहीं चलता। ऐसे ही उस दिन वह अपने कमरे में बैठी कोई पत्रिका पढ़ रही थी कि भावना कमरे में आती दिखी।

-    अरे तू कब आई?

-    तेरा घर ऐसे ही खुला है, कोई भी आ जाए,मैं ही क्यों?

-    आ जाए तो आ जाए, हाहाहाहा अतिथि देवो भव।

-    और यदि कोई बदमाश आ गया तो!

-    तूने बाहर चार-पाँच मिस्त्री काम पर लगा रखे हैं, उनके हाथ में आरी, हथौड़ी जैसे औजार हैं, किसकी हिम्मत है, ऐसे ही अंदर आने की।

-    मिस्त्री मत बोल रे

-    अच्छा बाबा कारपेंटर, सॉफ़िस्टिकेटेड लगता है न हाहाहाहा

-    कारपेंटर भी नहीं, आर्किटेक्ट बोल।

-    अरे तुम्हारे दोस्त के बारे में नहीं कह रही, वो आर्किटेक्ट है माना, पर बाकी तो उसके यहाँ काम करने वाले हैं न।

-    वो मेरा दोस्त नहीं है।

-    अच्छा बाबा परिचित है। बैठेगी भी या खड़े-खड़े ही बहस करने के मूड में है।

-    हाँ, अच्छा परिचित है, नहीं पहले काम का मुआयना करूँगी।

-    जा कर ले...मैं तो बेज़ार हो गई, पता नहीं कब ख़त्म होगा। पहले बोले थे आठ दिन में हो जाएगा पर अब महीना होने को आए।

-    आठ दिन में जितना करना था, उतना तो हो गया, अब तुम लोग ही बढ़ा रहे हो कि यह भी करना है, वो भी करना है।

-    हम क्या बढ़ा रहे हैं तुम्हारे आर्किटेक्ट गणेश जी ने ही कहा ये भी करवा लीजिए, वो भी करवा लीजिए..अब बजट भी बढ़ गया।

-    अरे तुमसे ज़्यादा नहीं लेंगे, तुम मेरी सहेली हो।

-    वाह जी सहेली हो, पर पक्ष तो आर्किटेक्ट का ले रही हो। और वैसे भी घोड़ा, घास से दोस्ती करेगा, तो खाएगा क्या?

-    घोड़ा किसे बोल रही है।

-    नहीं बाबा, खुद को घास बोल रही हूँ। वैसे तू बता, तू क्यों इतना पक्ष लिए जा रही है।

-    मैं कहाँ पक्ष ले रही हूँ।

-    देख रही हूँ, जबसे आई है, उसी की बातें की जा रही है।

-    तेरे यहाँ काम चल रहा है न, तो काम के बारे में पूछ रही हूँ।

-    मैं क्या तुझे दूध पीती बच्ची दिख रही हूँ, जो तू जो बोले वो सुन लूँगी।

-    नहीं तू तो हम सबकी नानी है। अरे कुछ नहीं कहा न दोस्त है।

-    चल बाबा मान लिया, लेकिन तू भी याद रखना दोस्त, दोस्त होता है, प्रेमी, प्रेमी और पति, पति।

-    हाँ, मुझे सब याद है। वह भी शादीशुदा है। उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी है।

-    ये ले, अब उसकी पत्नी के बारे में मैंने कब पूछा, और उसकी पत्नी के बारे में जानकर मैं क्या करूँगी।

-    नहीं, ऐसे ही बताया, तू कुछ और न सोचने लगे।

-    मैं कुछ नहीं सोच रही, पर मुझे लग रहा है कि तू चाहती है कि मैं कुछ और सोचूँ, ऐसा कुछ है क्या।

-    छोड़ न

-    छोड़ न, मैंने कब पकड़ा है, तूने पकड़ रखा है।

इस बात पर दोनों हँस दी। भावना कुछ देर बैठकर चली गई।

--

आज भावना फिर आई थी, फ़र्नीचर बन गया था, सब चकाचक था लेकिन भावना उत्साहित नहीं थी। उसके चेहरे की रौनक गायब थी।

प्रिया ने पूछा- क्या हुआ?

-    कुछ नहीं, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है कि सब दूर चले गए हैं।

-    दूर चले गए हैं, तो तू उनके पास चली जा, जैसे तू यहाँ आई है।

-    इतना आसान नहीं होता न सब।

-    अब खुलकर बताएगी भी कि क्या हुआ।

-    गणेश से बात नहीं हो रही।

-    ठीक है तो हो जाएगी, इतनी चिंता क्यों करती है।

-    ऐसा नहीं है, पहले उसका दो-तीन बार फ़ोन आया तो मैं व्यस्त थी, फ़ोन नहीं उठा पाई थी। अब लग रहा है जैसे वो उस बात का बदला ले रहा है।

प्रिया ने फ़िल्मी अंदाज़ में संवाद फेंका - बदले की आग में जल रहा प्रेमी।

भावना बिल्कुल भी हँसने के मूड में नहीं थी। वह बोली- वह मेरा प्रेमी नहीं है।

-    फिर क्यों इतनी परेशान हो रही है।

-    क्यों, क्या दोस्तों के लिए परेशान नहीं हो सकते हैं।

-    हो सकते हैं लेकिन दोस्तों के लिए इस तरह परेशान नहीं होते। मैं तुमसे कितने दिन, महीने भी बात नहीं करती, तो क्या तुम ऐसे परेशान होती हो। दोस्ती में अधिकार होता है लेकिन एकाधिकार नहीं होता, एकाधिकार प्रेम में होता है और वहीं प्रेम को ख़त्म कर देता है।

-    प्रेम नहीं है, और क्या यह उम्र है प्यार करने की, मेरा घर-परिवार है, उसका घर-परिवार है, ऐसे में प्रेम कहाँ से आएगा।

-    तो क्या घर-परिवार होने से, उम्र हो जाने से प्रेम करने की इच्छा ख़त्म हो जाती है। तो भैया कहा कर, जैसे अधिकांश लोग कहते हैं एक-दूसरे को भैया-बहन और बाकी सारी भावनाएँ दबा देते हैं। नैतिक बनने का स्वाँग रचना और विद्रोह करना दोनों एक साथ नहीं हो सकता।

-    तो क्या तू भी समझ रही है कि मैं कुछ अनैतिक कर रही हूँ?

-    मैं कुछ नहीं समझ रही, मैं कुछ समझना भी नहीं चाहती। प्यार दो लोगों का व्यक्तिगत मुद्दा है और इस पर समाज का दबाव नहीं होना चाहिए।

-    पर प्रिया, समाज, लोग, रिश्तेदार, हमारे परिवार, बच्चे ये सब भी तो हैं।

-    यह सब तो तब भी था, जब तुम प्यार में पड़ी, तब सोचना था, अब क्यों सोच रही हो।

-    तब लगा था केवल दोस्ती है, लेकिन दोस्ती से ज़्यादा था, उससे बातें करना अच्छा लगता था, अच्छा लगता है, मैं खुश होती हूँ।

-    तो खुश रह, खुश रहना गुनाह नहीं है, पाप नहीं है।

-    हाँ प्रिया मुझे अब यही बात खाए जा रही है कि मैं पाप कर रही हूँ।

-    विश्वास रखो, खुद पर, उस पर। हो सकता है वो सच में व्यस्त हो, जैसे तुम थी। जब समय मिलेगा वो बात कर लेगा। जिस रिश्ते में इतना भी विश्वास न हो, उससे बाहर निकल जाना चाहिए।

-    मुझे उस पर पूरा विश्वास है।

-    कहाँ है, तुम्हें तो उस पर उतना भी विश्वास नहीं जितना किसी सिंपल फ्रैंड पर होता है। तुम मुझ पर भरोसा करती हो तो उस पर क्यों नहीं कर पाती, जबकि मैं तो तुम्हारी केवल एक सहेली हूँ।

-    तुम केवल सहेली नहीं, तुम पक्की सहेली हो।

-    तो क्या तुम्हारा प्यार कच्चा है। अभी तुम अपनी उम्र की बात कर रही थी, लेकिन कहो क्या तुम्हारा प्यार कच्ची उम्र का केवल आकर्षण है। आकर्षण है तो छोड़ दो। हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती और यदि तुम्हें लगता है कि यह सोना है तो उसे सँभालकर रखो। सोने के लिए किसी शो ऑफ़ की ज़रूरत नहीं होती।

-    शो ऑफ़! नहीं, शो ऑफ़ कहाँ कर रही हूँ?

-    तो यह क्या है, तुम चाहती हो कि वह लगातार दिखाता रहे कि वह तुमसे प्यार करता है। तुम्हारा फ़ोन तुरंत उठाए, पर हो सकता है वह व्यस्त हो, या हो सकता है ऐसी जगह हो जहाँ से बात नहीं कर सकता हो। भरोसा रखो न। इतनी ज़रूरतमंद क्यों बन रही हो।

-    ज़रूरतमंद नहीं, चिंता हो रही थी।

-    किस बात की चिंता? तुम्हारी इसी चिंता ने उसे बदल दिया है। तुम इतनी परेशान होती हो, फिर परेशान करती हो। क्यों परेशान होती हो। वो तुमसे भाग रहा है तो उसकी वजह खुद में तलाशो, उसे अपराधी मत घोषित करो।

-     प्रिया तुम क्या कह रही हो, कुछ समझ नहीं आ रहा। मुझे तो अभी यही समझ नहीं आ रहा कि मैं सही रास्ते पर हूँ या नहीं।

-    तुम्हें यदि लगता है कि तुम सही रास्ते पर हो, तो सही रास्ते पर हो। किसी से प्यार करना अपराध नहीं है। प्यार तो सबसे अच्छी, खूबसूरत भावना है। पर जब उसमें डर, जलन, अविश्वास, एकाधिकार आ जाता है तो वह प्यार को खा जाता है। इसलिए प्यार मर जाता है। दोस्ती में ऐसा कुछ नहीं होता, इसलिए दोस्ती लंबे समय तक टिक जाती है। प्रेमी को पहले दोस्त बनाओ तब तो प्रेमी बना पाओगी और प्रेमी बन जाओ तो मालिकाना अधिकार मत जताने लगना।

-    तू तो यह बता मैं सही कर रही हूँ या नहीं।

-    मैं केवल इतना कह रही हूँ जो तुम्हें सही लगता है, वह करो। अपने आप में रहो, किसी और की ज़रूरत ही क्या है। खुद को परिपूर्ण कर लो, खुद में ही उसको पा लो, जिससे प्यार करती हो।

-    तुम्हारे पास सुलझने आई थी, तुम उलझा रही हो।

-    कहाँ उलझा रही हूँ, कितनी तो साफ़ बात कह रही हूँ। सुभद्राकुमारी चौहान की कविता याद है-खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी। झाँसी की रानी बनना है तो मर्द भी तुम्हें ही बनना होगा, किसी दूसरे पर आश्रित क्यों होना कि कोई और आएगा और तुम्हारी झाँसी तुम्हें देगा। तुम खुद कहो कि मैं अपनी झाँसी किसी को नहीं दूँगी।

-    अब झाँसी कहाँ से आ गई।

-    झाँसी मतलब सत्ता। अपनी सत्ता, अपनी ताकत दूसरे के हाथ में सौंपकर चाहती हो कि वह तुम्हें खुश रखे। तुम्हारे खुश होने न होने का अधिकार तुम्हारे अपने पास होना चाहिए। अपने ही भीतर स्त्री-पुरुष दोनों को पा लो। बाहर क्यों ढूँढती हो? बाहर क्या ढूँढती हो? खुद से एकाकार क्यों नहीं हो जाती?

-    प्रिया तुम मुझे उलझा रही हो।

-    नहीं तो, मैं तो यह कह रही हूँ कि अपने आप में रहने का आनंद मनाओ। यदि तुम्हें खुद के साथ रहना ही पसंद नहीं तो किसी दूसरे को तुम्हारे साथ रहना क्यों पसंद आना चाहिए। तुम खुद को रिजेक्ट कर रही हो और दूसरे को ब्लेम कर रही हो कि वह तुम्हें रिजेक्ट कर रहा है।

-    तो क्या उसे भुला दूँ?

-    ये कब कहा? पर पहले खुद कौन हो, क्या हो, इसे याद रखो। वो तुम्हें क्यों पसंद करता था क्योंकि तुम ज़िंदादिल थी। अब यदि तुम उसके बारे में सोच-सोचकर हलकान होती रहोगी तो परेशान रहोगी, जिंदादिल नहीं।

-    तुम जाने कौन सी दुनिया की बात कर रही हो।

-    मैं इसी दुनिया की बात कर रही हूँ। तुम अब गणेश से प्यार नहीं करती बल्कि उससे झगड़ना चाहती हो, कि वो फ़ोन क्यों नहीं करता, फ़ोन क्यों नहीं उठाता, तुम किसी के बारे में ऐसी भावना रखोगी तो वह क्यों तुमसे बात करना चाहेगा। गुस्सा छोड़ो, यह द्वेष या जलन मत रखो कि वह सबसे बात करता है तुमसे नहीं करता, यह तुलना करना बंद कर दो और उसके प्रति आसक्ति मत रखो। आसक्ति पकड़कर रखती है, छोड़ दो। प्यार को विस्तार दो तो बुद्ध बन जाओगी।

-    मुझे बुद्ध नहीं बनना।

-    इसलिए तो बुद्ध नहीं बन पा रही हो। तुम्हें परित्यक्ता बनने की चाह है तो तुम परित्यक्ता बनती जा रही हो, जिसे किसी ने छोड़ दिया है। बुद्ध कहते हैं राग, द्वेष, आसक्ति से दूर रहो तो सबमें मैत्री का भाव आ जाएगा। मैत्री रखो। इतनी सी तो बात है। खुले दिमाग से सोचो। तुम और दूसरे अलग तरीके से सोचते हैं, वो वैसा नहीं सोचते जैसा तुम्हारी अपेक्षा है। तुम्हारी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा तो वह प्रेम नहीं, तुम्हारा बर्थडे याद नहीं रहा तो प्रेम नहीं, ऐसी छोटी-छोटी परीक्षाओं पर सोने को परखोगी। वो भी चाहता होगा कि तुम उसे समझो, जैसे उसकी अपेक्षा है। ये अपेक्षाओं का बोझ प्यार को मार देता है। दोस्ती में अपेक्षा नहीं होती।

-    तुम क्या चाहती हो?

-    मैं कुछ नहीं चाहती और रिश्ता तुम्हारा है, तुम क्या चाहती हो, पहले यह तलाश करो। तुम उस व्यक्ति को चाहती हो तो वो जैसा है, उसे वैसा स्वीकार करो। तलवार लेकर मत खड़ी रहो। तलवार लेकर खड़ी रहोगी तो कोई तुम्हारे पास क्यों आएगा?

-    मैं क्या करूँ?

-    वो करो, जो तुम्हारा दिलो-दिमाग कहता हो। पर उसके लिए पहले शांत रहो। शांत रहकर नहीं सोचोगी तो वो आएगा, जाएगा, फिर आएगा, फिर जाएगा। वो नहीं तो कोई दूसरा आएगा, फिर जाएगा, फिर आएगा। यह चलता रहेगा और तुम्हें कहीं शांति नहीं मिलेगी। थोड़े दिन शांत रहो।

-    कैसे शांत रहूँ, मेरे बात करने न करने से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उसके स्टेटस अपडेट देखो, कितना खुश है।

-    स्टेटस अपडेट वर्चुअल होते हैं, आभासी। वे ऐसे होते हैं, जैसे लोगों को दिखाने के लिए रखे जाते हैं, ज़रूरी नहीं कि वो सच हों।

-    मैंने कुछ दिन अपना स्टेटस ब्लैंक कर दिया था ताकि उसे पता चले कि मैं दु:खी हूँ।

-    पर उसे क्यों लगे कि तुम दु:खी हो। तुम सुखी हो, ऐसा क्यों न लगे। दु:खी होना क्यों चाहती हो? खुश रहो। अपने आप में खुश रहो। यदि खुद के साथ खुश नहीं, तो दूसरे के साथ कैसे खुश रहोगी? इस वक्त यदि मैं कहूँ कि अपना एक फ़ोटो दो, तो तुम मुझे कौन-सा फ़ोटो दोगी, हँसता हुआ या रोता हुआ।

-    हँसता हुआ

-    मतलब तुम खुद भी चाहती हो न कि किसी के सामने तुम्हारा द बेस्ट जाए। तुम भीतर से टूटी हो तब भी बाहर से खुश दिखोगी न, फिर उससे शिकायत क्यों? खुद को जानोगी तभी किसी और को जान पाओगी।

भावना अभी न खुद को जान पा रही थी, न किसी और को। वह वैसे ही संभर्म में उठी और चली गई। दीवार पर सजे गौतम बुद्ध मुस्कुरा रहे थे,कृष्ण हँस रहे थे और प्रिया के चेहरे पर भी स्मित मुस्कान थी।

 

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