गेटअप, गेट अप!
नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका अभिनव इमरोज़ के नवम्बर 2021 अंक में
गेटअप, गेट अप!
स्वरांगी साने
शहर का वैसे तो यह गहमागहमी वाला कॉफ़ी हाउस था लेकिन यहाँ हर किसी को बैठने की जगह और प्राइवेसी मिल ही जाती थी। आशिमा को यह कॉफ़ी हाउस बहुत पसंद था। जब भी मौका मिलता वह यहाँ आया करती, कई बार तो अकेले ही। हालाँकि आज उसने प्रिया से पूछा था कि क्या वह उसे कंपनी देने आ पाएगी? प्रिया ने जानना चाहा, क्या इसकी कोई ख़ास वजह? आशिमा ने कहा, ‘ऐसे ही वह बहुत थक गई है और थोड़ा फ्रैश होना चाहती है, किसी से बात करने का मन कर रहा है और प्रिया से बेहतर कौन हो सकता है, जो उसकी बात सुनेगा’!
प्रिया हँस दी। समय निकाल पाना थोड़ा कठिन था लेकिन प्रिया सहेलियों को कभी नहीं जताती थी कि वो व्यस्त है या नहीं आ सकती। तय समय पर प्रिया वहाँ थी। आशिमा भी उस वक्त रिक्शा से उतर रही थी। प्रिया उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई और बोली- हैलो मैडम!
- हैलो!
- बताइए आज आपने कैसे याद किया?
- अरे अंदर तो चल और ये क्या आप-आप लगा रखा है।
- ऐसे ही सोचा मैडम की थोड़ी क्लास ली जाए।
- वाsह, अब तुम ही बची थी।
आशिमा उस शहर के कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य की प्रोफेसर थी और प्रिया रिपोर्टर। दोनों का अलग-अलग पेशा उनके पहनावे में भी दिख रहा था। आशिमा कड़क स्टार्च की हुई कॉटन की सफेद साड़ी पहने थी जिस पर हरे रंग के छोटे-छोटे फूल बने थे। प्रिया ने नीली जींस और हलके गुलाबी रंग का कैजुअल टॉप पहना था। आशिमा ने अपने पूरे सफेद बालों का जूड़ा बाँध रखा था। आँखों पर काली मोटी फ्रैम का चश्मा चढ़ा था। गले में मोतियों की छोटी माला और कान में छोटे से टॉप्स थे। माथे पर मैरून रंग की बड़ी सी बिंदी लगाई थी। प्रिया के गेटअप में ऐसा कुछ भी नहीं था। उसके कानों में हमेशा ही सोने के टॉप्स डले रहते थे। उसने बालों की हाई पोनी की थी। प्रिया के कुछ-कुछ बाल सफ़ेद हो रहे थे जिन पर शायद वह मेहंदी लगा लिया करती थी। दोनों समवयस्क थीं, लेकिन उनके गेटअप से उनकी उम्र में फासला नज़र आ रहा था। फासला कुछ और भी था, प्रिया को लगातार किसी न किसी के फ़ोन आ रहे थे, कभी वो किसी को मैसेज कर रही थी, जबकि नीलाबंरा शांत मूर्तिवत् बैठी थी। थोड़ी देर बाद प्रिया को ही अहसास हुआ, उसने कहा- सॉरी यार, वर्किंग डे और तूने बीच में ही बुला लिया। वो तो दोपहर का समय था इसलिए आ भी गई। बता कैसे याद किया?
- तू मेरे सामने है और दुनिया भर की बातों में लगी हुई है। देख ले पहले दुनिया में क्या चल रहा है, फिर सहेली की सुध लेना।
- ओह, कम ऑन, तेरी ही तो सुध लेने आई हूँ। ले मैं अपना फ़ोन साइलेंट पर रखती हूँ। अब बता क्या बात है?
- कुछ नहीं यार थक गई हूँ।
- तो घर जाकर आराम कर, भरी दुपहरी यहाँ क्यों आ गई?
- वैसे नहीं यार, मन से थक गई हूँ। इडविन आरलिंगटन अपनी कविता ‘द हाउस ऑन द हिल’ में कहते हैं न, ‘दे आर ऑल गॉन अवे, द हाउस इज़ शट एंड स्टिल, देअर इज़ नथिंग मोअर टु से’।
- मुझे तो स्टाइल कौंसिल का गाना याद आ गया पर ‘ऑल गॉन अवे- देअर इज़ नथिंग लेफ्ट सो, दे हैव ऑल गॉन अवे’। यह कहकर प्रिया गुनगुनाने लगी।
- मुझे फ्रस्ट्रेशन हो रहा है और तुझे गाना सूझ रहा है।
- तू भी गाने लग, फ्रस्ट्रेशन चला जाएगा।
- तुझे नहीं पता क्या, मूड अच्छा हो तो धुन अच्छी लगती है, मूड खराब हो तो गाने के शब्द बींधते हैं।
- तो मैडम के मूड को क्या हुआ?
- यार घर पर, कॉलेज में सबको लगता है, मैं बहुत खड़ूस हूँ।
- हाँ तो तू रहती भी ऐसे हैं और बिहेव भी वैसे ही करती है।
- तेरी तरह रहने लगूँ तो दुनिया कच्चा चबा जाए, हमारी सोसाइटी अभी भी सिंगल वर्किंग वूमन के लिए तैयार नहीं हुई है।
- दुनिया जिस भाषा में बात करती है, उससे उस भाषा में बात कर, लेकिन हमेशा क्यों संजीदा रहती है,थोड़ी रिलेक्स हो, थोड़ी ज़िंदगी जी ले। इमाम बख़्श नासिख़ का शेर पता है न ‘ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं’
- ज़िंदगी शायरी नहीं है, शायरी जैसी खूबसूरत नहीं है।
- तो उसे खूबसूरत बना ले।
- अकेली रहती औरत यदि सबसे ज़्यादा हँसने-बोलने लग जाए तो उसे फ़्लर्ट समझते हैं।
- और हँसो-बोलो नहीं तो खड़ूस समझते हैं, तो छोड़ न, दुनिया क्या समझती है, जैसा तुझे अच्छा लगता है, वैसी जी ले।
- जैसा चाहे, वैसा भी तो जीने नहीं देते, फिर चिढ़चिढ़ाहट इतनी बढ़ जाती है कि किसी पर भी गुस्सा उबल पड़ता है। उस दिन मैं कॉलेज लाइब्रेरी में बैठी थी। कुछ लड़कियाँ हँसते हुए आईं, मैंने उनकी ओर घूरकर देखा और चुप रहने का सख़्त इशारा किया। वे पलभर के लिए चुप हो गईं लेकिन उनकी फुसफुसाहट भी लाइब्रेरी की शांति में साफ़ सुनाई दी, वे कह रही थी, मैडम की शादी नहीं हुई इसलिए खड़ूस हो गई हैं। क्या सच प्रिया, ऐसा है?
- यदि तुम्हें ऐसा लगता है तो ऐसा हो भी सकता है। तुमने जीवन का रस लेना बंद कर दिया हो। कहीं न कहीं तुम्हें लगता है कि हँसने का अधिकार शादी से जुड़ा है। शादी नहीं हुई और अकेले रहना है तो कठोर रहना है। फिर जो भी तुम्हें खुश दिखता है, उससे तुम्हें तकलीफ़ होती है पर ऐसा किसने कहा कि अकेले रहना है तो कठोर बन जाओ और शादी न करने का निर्णय तुम्हारा अपना था, फिर मलाल क्यों?
- चार महिलाएँ कहीं बैठी नहीं कि पति-बच्चों की बातें करने लगती हैं। तब मेरे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होता। पुरुषों के साथ बैठूँ तो वे भी मिसेस ने यह कहा, वाइफ़ ये बोली कहने लग जाते हैं, वहाँ भी मैं खुद को अकेला पाती हूँ। मेरे पास कहने को वहाँ भी कुछ नहीं होता।
- तू उसे नॉर्मली लिया कर न। अब तूने मुझे लाइब्रेरी का जो अनुभव बताया, वह मेरे पास नहीं था या मैं किसी ख़बर को लेकर तुझसे चर्चा करूँ तो तेरे पास मुझे देने के लिए कोई इंफ़ो नहीं होगी पर क्या तब मुझे या तुझे ऐसा लगता है कि हममें कुछ कमी है। फिर पति-पत्नी की बात आने पर तुझे ऐसा क्यों लगता है कि तेरे पास बात करने को कुछ नहीं। जब किसी विषय पर बात करने को कुछ नहीं होता, तो हम चुप रहते हैं, यह सामान्य बात है। तू भी इसे उतने ही सामान्य तरीके से ले।
- पता नहीं क्यों लगता है जीवन में कुछ अधूरापन है।
- तुझे क्या लगता है क्या तुझे पूरा करेगा?
- पता नहीं, कभी-कभी लगता है कोई जीवनसाथी चाहिए, लेकिन अब उम्र में नए सिरे से ऐडजस्ट कर पाऊँगी या नहीं।
- सवाल अधूरा मत छोड़। सवाल की तह तक जा, तुझे जीवनसाथी क्यों चाहिए?
- क्यों चाहिए मतलब, सबको चाहिए होता है, लगता है हम अधूरे हैं। कोई साथ हो तो लाइफ़ में बैलेंस आ जाएगा शायद।
- हाँ, सही कहा, शायद। तुझे क्या लगता है शादी के बाद सब ठीक हो जाता है? गृहस्थी की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, फिर तुझे लगेगा, आए थे हरि नाम को, ओटन लगे कपास।
- तू मुझे हिंदी मत सिखा, अंग्रेजी के प्रोवब्रस और ईडियम्स मैं भी तुझे सुना सकती हूँ।
- बस इसीलिए तू खड़ूस कहलाती है। तूझे ऐसा क्यों लगता है, मैं या कोई भी दूसरा तुझे कुछ ज्ञान दे रहा है। मैंने तो बस उस बात से कहावत याद आ गई, तो बता दी। कहावतें किसी को कुछ सिखाने-सुनाने के लिए थोड़ी होती हैं, वे तो बड़ी बात, छोटे में समझने-समझाने के लिए होती हैं। बड़ी बात यह है कि तू अपने में खुश रह। अपने में खुश रहने वाला गृहस्थी में भी खुश होता है और अकेले भी।
- मतलब तेरा कहना है, मैं खुश नहीं हूँ। वो तो तुझे आज कॉफ़ी पीने बुला लिया, लेकिन कितनी ही बार मैं अकेले भी यहाँ कॉफ़ी पीने आ जाती हूँ। मैं अपने आप के साथ खुश हूँ।
- यह तू खुद को जताती है। जता मत, वैसे जी। खुश रह।
- खुश रहने से डर लगता है।
- खुश रहने में डर कैसा?
- पता नहीं, पर अकेले रहने में भी डर लगता है।
- अपने आप से क्यों डरती है? अपने आप की कंपनी इंजॉय कर। अपने आपके साथ खुश रह।
- क्या ऐसा हो सकता है?
- हाँ क्यों नहीं हो सकता!
- खुद के लिए इतनी क्रूर मत बन।
- क्रूर? मैं कुछ समझी नहीं। अच्छे से हेल्दी लाइफ जी रही हूँ। हेल्दी डायट लेती हूँ, एक्सरसाइज़ करती हूँ, अच्छी साड़ियाँ पहनती हूँ।
- ..लेकिन खुश होना चाहती तो है, पर खुश नहीं हो पाती। चेहरे पर कठोरता लिए बैठी है। जितनी कड़क तेरी साड़ी है, उतना ही कड़क तेरा ऐटिट्यूड है। थोड़ा रिलैक्स हो, ताकि थकान नहीं आएगी। तूने कहा तुझे थकान महसूस हो रही है लेकिन तू भी जानती है यह शरीर की थकान नहीं है। तेरा मन थक रहा है, तू मन से बूढ़ी हुई जा रही है।
- तो क्या करूँ?
- हँसना शुरू कर, बालों का जूड़ा इतना कसकर मत बाँध, कभी-कभी बिना स्टार्च की साड़ी भी पहनकर देख। ये मोटी फ्रैम का चश्मा हटा, चश्मे की फ्रैम लाइट कर, अपने जीवन को थोड़ा लाइट कर, नया चश्मा पहनकर दुनिया को देख।
- मुझे हलका-फुलका जीना पसंद नहीं।
- तू समझी नहीं, मैं डायल्यूट होने की बात नहीं कर रही। मैं कह रही हूँ अपनी एनर्जी को लाइट कर, नई चीज़ों का स्वागत कर। ज़िंदगी जो तुझे देना चाहती है, उसे ले, ज़िंदगी का स्वागत कर। चल मेरे अगले वीक ऑफ़ पर तेरे लिए खरीदारी करने चलते हैं। थोड़े ट्रेंडी कपड़े खरीद अपने लिए। कॉलेज के प्रोफेसर भी अब सलवारसूट पहनने लगी हैं। तू तो इतने यंगस्टर्स के साथ रहती है, खुद भी तो यंग महसूस कर।
- इस चालीस की उम्र में?
- हाँ इसी चालीस की उम्र में।
ऐसा कहते हुए प्रिया हँस दी। कॉफ़ी का बिल आ चुका था, प्रिया ने बिल भर दिया और कहा- नाउ गेटअप बी हैप्पी, पर्स उठाकर चलते हुए बोली- अगली पार्टी तेरी तरफ़ से होगी, नई आशिमा के साथ।
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