मुनिया की दुनिया

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किस्सा 5 रात के दस बज गए थे। मैंने अपनी बेटी को बुलाया और बाकी सब बच्चों को भी कहा अपने-अपने घर जाओ। मुनिया को और खेलना था। मैं- नहीं बेटा..बाहर इतनी रात गए नहीं खेलते, बहुत रात हो गई। मुनिया- तो मैं आपके घर खेलूँगी। मैं- नहीं बेटा अब खाना खाओ, सो जाओ। मुनिया- बाबा (पिता) आने वाले हैं। मैं- अरे वाह। तब तो घर जाओ। यदि वे घर आए और उन्हें पता चला कि तुम घर पर नहीं हो तो फिर ऑफ़िस चले जाएँगे। …. मुनिया लपक कर घर चली गई। कितनी मासूम होती है न यह उम्र। उसे सच लगा कि पिता ऐसा भी कर सकते हैं..सुबह के गए हैं, अब आएँगे और मैं न मिली तो फिर ऑफ़िस चले जाएँगे। मतलब ये ऑफ़िस वाले, दिन के वे सारे घंटे छीन लेते हैं जो पिता के जाने पर उनके बच्चे उनकी राह तकते बिताते हैं। देर रात थक कर आने वाले पिता, देर रात थक चुकी मुनिया…पर दोनों की एनर्जी फिर फुल ऑन होती है और मेरे घर तक मुनिया की खिलखिलाहट की गूँज आती है। …ओह पर फिर सुबह होगी, …पिता को फिर ऑफ़िस जाना होगा…और तब मुनिया का रोना सुनाई देगा- ‘बाबा नका न जाऊ ऑफिस’ … अबकी मुनिया आएगी तो उससे कहूँगी चलो हम मिलकर ऑफिस से कट्टी कर लेते हैं..जो सबके ‘बाबा’ को ले जाकर ‘बाबू’ बना देते हैं। मुनिया ‘बाबू बनना’ क्या होता है नहीं जानती, वह केवल ‘बाबा’ जानती है..

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