स्वरांगी साने पूर्व वरिष्ठ उप संपादक, लोकमत समाचार,पुणे • जन्म ग्वालियर में, शिक्षा इंदौर में और कार्यक्षेत्र पुणे जीवन का लक्ष्यः कुछ सृजनशील लमहों की खोज शिक्षाः • एम. ए. (कथक) (स्वर्णपदक विजेता) देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से • बी.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य) प्रथम श्रेणी • विशेष योग्यता (Distinction) के साथ कथक विशारद (Distinction), अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज (मुंबई) • डिप्लोमा इन बिज़नेस इंग्लिश, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर कार्यक्षेत्र : कविता, कथा, अनुवाद,संचालन, स्तंभ लेखन, पत्रकारिता,अभिनय, नृत्य, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षा, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर वार्ता और काव्यपाठ प्रकाशित कृति : • काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” 2002 में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यक्रम में म.प्र. के महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित। • काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्...
शिकायत नहीं स्वरांगी साने सब कुछ तयशुदा समय पर हो रहा था दिन ढल रहे थे रातें जा रही थीं सब कुछ था जीवन में सिवाय तुम्हारे। एक दिन किसी ने बताया वहाँ उस वृक्ष के नीचे बैठे हो तुम समाधिस्थ वो दौड़ पड़ी पर जैसे दूर-दूर होते चले गए वृक्षों के झुरमुट किस वृक्ष के नीचे खोजती तुम्हें वो रही अनजान। उसने उठा लिया वहीं पड़ा बाँस का टुकड़ा फूँक दिए प्राण। एक के बाद दूसरी फिर तीसरी-चौथी अनगिनत तानें निकलती गईं बिखरते गए सुर पर वे भी नहीं खोज पाए तुम्हें। वो दौड़ती रही वन प्रदेशों में चुभते रहे पैरों में काँटे बिना रोली ही छोड़ते गए उसके निशान जंगलों में वो उठाती चली गई मोरपंखों को उनमें कहीं मिल जाओगे तुम शायद पर ऐसा नहीं होना था नहीं हुआ। कितने दिन बीते ये भी याद नहीं आसमान होने लगा श्यामवर्णी और बिजली की कौंध-सी छाने लगी सफ़ेदी बालों में आकाश का कालापन आँखों के नीचे जमता चला गया। उसने देखी पानी में अपनी छवि पर उसमें दिखाई देती रही उसे तुम्हारी ही मूरत। वो तुम्हें खोजती रही इस खोज का कोई अंत नहीं जैसे कोई मुक्ति नहीं इस श्राप से। पर अब उसने जान लिया है इस सत्य को और खुद को मुक...
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