सूने घर में बच्चे/ सूने घर में बच्चे


सूने घर में बच्चे
स्वरांगी साने

वे लौटते हैं घर
उनके कंधों पर होता है
बोझ बस्तों का   
वे खोलते हैं किवाड़
परे रखते हैं बस्ता   
हावी हो जाती है तन्हाई।
उनकी थकी आँखों में
भर जाती हैं उदासी।

वे तन्हाई में करते हैं
बातें दीवारों से
सूने घर में                  
अक्सर बच्चे
अपने माँ-बाप की 
आवाज़ तलाशते हैं । 

 (इसमें असमीया, अंग्रेजी, उड़िया, उर्दू, कश्मीरी, कन्नड़, कोंकणी, गुजराती,डोगरी,तमिल, तेलगु,नागा, नेपाली, पंजाबी, ब्रज, बंगाली,बोडो, भोजपुरी, मणिपुरी, मलयालम, राजस्थानी, संथाली, संस्कृत, सिंधी और हिंदी भाषा से अनुदित कविताएं हैं)

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