शहर की छोटी सी छत पर/ स्वरांगी साने
वाराणसी से प्रकाशित पत्रिका सच की दस्तक के नवंबर 2021 के अंक में
शहर की छोटी सी छत पर
स्वरांगी साने
बचपन में खेला करते थे गाँव गाँव
बन जाता था कोई भी कप्तान
बाँट देता था काम
लड़कियाँ घरकुल बनातीं
लड़के पिस्तौल से डराते दुश्मन को
तब कोई नहीं चाहता था बनना बच्चा
बन जाता था
मम्मी- पापा
पनवारी,धोबी, मोची,
दुकानदार, ग्राहक, नौकर,
स्कूल टीचर या हेडमास्टर
शहर की एक छोटी सी छत पर
बस जाता था पूरा गांव
जो आज चमार बनता
अगले दिन वो मास्टर बन जाता
चपरासी हो जाता पोस्टमैन
दुकानदार
बदल जाता ग्राहक में
दूसरे दिन
कोई और ही होता कप्तान
लड़कियां फिर संभालती घरकुल
लड़के पिस्तौल
रोज खेल होने पर
कर लेते चट्टा-मट्टा
खेलते दूसरा नया खेल
सितौलिया
छिपाछाई
विष अमृत
नदी पहाड़
या फिर वहीं गाँव गाँव
आज हम बड़े हो गए हैं
मिल गया है लाइसेंस पिस्तौल का
वह मोची ही लगता है
मंटू नहीं
पान की दुकान पर
दूसरी सहेलियों की तरह
मैं भी नहीं जाती
जबकि बैठता है वहाँ संजू ही
अब रोज़-रोज़
नहीं बदलता चित्र
रघु के डाक देने आने पर
नहीं पूछते
मामाजी की चिट्ठी आई
डरने लगे हैं कप्तान से
हर दिन नहीं बदलता अब कप्तान
टोनू, पिंकी, रीनी,मिली
राजू, पप्पू, बबलू
बड़ी बड़ी नेम प्लेटों पर
प्रतिष्ठा पा रहे हैं
शहर में रहते हम
खेला करते थे गाँव गाँव
हम एक और बार
खेलना चाहते हैं
और अब बनना चाहते हैं बच्चा।
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