जीवन की गाड़ी का ऐक्सलेटर
जीवन की गाड़ी का ऐक्सलेटर
स्वरांगी साने
पृथ्वी
पर प्रगत (विकसित) प्रजाति आकार ले रही है। उन्हें कैसे पहचाना जा सकेगा? उनके पास
अत्याधुनिक तकनीक हैं या उन्होंने जीनियस आविष्कार कर लिए हैं। वे भविष्य की झलक देख
सकते हैं। कुछ होने से पहले उसका अंदेशा लगा पाना उनके लिए आसान होता है। उन्हें पूर्वाभास
हो जाता है और वे सक्षम होते हैं। इस प्रगत प्रजाति के बारे में कहा जा रहा है कि उनमें
यह शारीरिक क्षमता होती है कि वे दूसरे की ऊर्जा प्रछाया को पहचान लेते हैं। दुनियाभर
में इन गुणों से लबरेज लोग हैं। केवल इतना नहीं है कि हम उन्हें पहचान नहीं पाते बल्कि
उन लोगों को भी इसका ज्ञान नहीं होता है कि उनमें यह क्षमता है। जब उन्हें पता ही नहीं
होता तो उनमें और सामान्य लोगों में क्या अंतर है? तो वह अंतर यह है कि प्रगत प्रजाति
के लोग कम उम्र से ही इन बातों को संज्ञान में लेने लगते हैं, महसूस करने लगते हैं
और उस ओर ध्यान देने लगते हैं। हम यदि जीनियस आविष्कार, पूर्वाभास या भविष्य की झलक
देख पाने की क्षमता को ऐसा कहें कि वह उनके डीएनए में ही होता है तब भी जब तक वे अपने
डीएनए से सुसंगत नहीं हो जाते वे इन चीज़ों को नहीं पहचान सकते। डीएनए से सुसंगति बैठाने
के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आप ऊर्जा के पिंड हैं। जैसे ही इसका बोध हो जाएगा
आप अपने बारे में नवीनतम खोज करने के लिए प्रवृत्त होने लगेंगे। आपने अपनी ऊर्जा को
समझ लिया तो आप अपने जीवन को भी अपने नियंत्रण में कर सकते हैं।
दुनिया
के सभी जीवित इसलिए ‘प्राणी’ कहलाते हैं क्योंकि उनमें प्राण हैं। इस प्राण का संबंध
कंपन ऊर्जा (वाइब्रेशनल ऐनर्जी) और आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) से है। सब कुछ सतत चलायमान
है, जिससे वह स्पंदित है। हम उसी कंपित ऊर्जा की बात कर रहे हैं जो अणु-परमाणु के रूप
में सारे चाँद-सितारों में भी है और उतने ही समान रूप से हममें भी है। विश्व का एक
हिस्सा यदि आप और हम हैं तो उसकी ऊर्जा और प्रकाश हममें भी समान रूप से संचारित हो
रहा है। सूर्य जैसे प्रदीप्त होता है तो ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश का पिंड होता है, आप
भी प्रदीप्त हो सकते हैं यदि ऊष्मा और ऊर्जा से भर जाए। अपने प्रकाश को पहचानिए। वैश्विक
स्रोत के साथ अपना तारतम्य बैठाइए। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि कुछ है जो आपको लगातार
चलायमान रखता है। जब कंपन नहीं होता तो ऊर्जा स्थिर होती है या कहें मृतप्राय होती
है। वैज्ञानिक डंकन मैगड्यूगल का वर्ष 1907 में प्रकाशित 21 ग्राम का प्रयोग काफ़ी
चर्चित रहा था उन्होंने मृत्यु से पहले और बाद में शरीर का वज़न मापा था और इस नतीजे
पर पहुँचे थे कि हमारी आत्मा या यहाँ प्राण कह लें, तो उसका वज़न 21 ग्राम है। तो क्या
हम अपने आपसे जुड़े सत्य को जानने के लिए तैयार हैं?
आप
किसी सभाकक्ष में हैं और बिजली चली जाए तो क्या होगा, आपको कुछ नहीं दिखेगा। जैसे ही
रोशनी आएगी या कोई बिजली का खटका दबा देगा और प्रकाश आ जाएगा तो आपको आसपास बैठे लोग,
मंच व्यवस्था सब दिखने लगेगी, फिर कोई बिजली बंद कर दे तो आपको फिर से दिखना बंद हो
जाएगा। बिजली वह ज़रिया है जो आपके लिए चीज़ों को दृश्यमान करता है। बिजली या ऊर्जा ही
हमारे भीतर स्पंदित प्राण है। कंपन ऊर्जा ही हमारे पूरे अस्तित्व को प्रकाशमान बनाती
है। इसी तरह सभागार के भीतर बैठे लोग बाहर क्या चल रहा है नहीं जान पाते और बाहर के
लोगों को भीतर क्या हो रहा है, पता नहीं होता है। यह स्थान सापेक्षता है। हमें कई बातें
पता नहीं होतीं तो हम उन पर विश्वास नहीं करते जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम जब अस्तित्व
में नहीं आया था उससे पहले भी गुरुत्वाकर्षण तो था ही। रिचर्ड जेम्स ने वर्ष 1940 में
स्लिनकी ईज़ाद किया जो एक खिलौना भर नहीं रह गया क्योंकि उसका स्प्रिंग खींचकर छोड़ने
के बाद वह फिर अपने पुराने आकार में आ जाता था।
इसी
तरह ऊर्जा का कभी क्षय नहीं होता है वह एक से दूसरे में बदलती है, हम भी पंच तत्वों
में विलीन हो जाते हैं, हमारा केवल भौतिक रूपांतरण होता है। हमें यह तो पता है कि हम
पंचमहाभूतों से बने हैं लेकिन हम यह मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा सारा ज्ञान
ससीम है, असीम नहीं। हमारा ज्ञान सीमित है। आँखें देख पाती हैं लेकिन आँखों से हम सुन
नहीं सकते, कान सुन लेते हैं पर उनसे बोल नहीं सकते, मुँह से बोलते हैं पर दिखाई नहीं
देता, त्वचा अनुभव कर पाती है पर कह नहीं सकती, नाक से सूँघ सकते हैं लेकिन उसका स्वाद
नहीं बता सकते, जीभ स्वाद बता देती है लेकिन रूप-रंग, आकार-प्रकार देखने के लिए उसे
आँखों की आवश्यकता होती है। एक इंद्रिय का दूसरी के बिना काम नहीं चल पाता और जब सब
मिलकर काम करते हैं तो हमें परिपूर्णता हासिल होती है। हेलन केलर न देख सकती थीं, न
सुन सकती थीं, न बोल सकती थीं, इसलिए शायद वह इसके मर्म को अधिक गहराई से समझ पाईं।
वे कहती हैं- “अकेले हम बहुत कम कर सकते हैं, साथ मिलकर हम बहुत कुछ कर सकते हैं।”
ऐसा ही विभिन्न विषयों के बारे में भी है। हमें विज्ञान के विषय पता होता है पर हम
साहित्य का मर्म नहीं समझ पाते, अक्षर पढ़ लेते हैं तो धर्म में लिखी बातें हमें थोथी
लगने लगती हैं, जबकि असल में हम उनका सही अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं।
भौतिकी
में क्वांटम सिद्धांत पढ़ा होगा। पूरा विश्व ऊर्जा की तरंगों से बना है और क्वांटम क्षेत्र
में ऊर्जा की अलग-अलग आवृतियाँ कार्य करती हैं। तो ध्यान रखिए इस क्वांटम सिद्धांत
में समय-काल का महत्व नहीं है और कुछ भी संभव हो सकता है। जो ऊर्जा हमें चारों ओर घेरे
है, वही ऊर्जा हमारे भीतर भी है। ऊर्जा की आवृत्ति में बदलाव आएगा तो आप अपने वर्तमान
समय को बदलने की क्षमता भी हासिल कर लेंगे। अब
स्वर्ग या नरक की परिकल्पनाओं को ही लीजिए, ये क्या हैं? आप बहुआयामी हैं, जब आप अपने
त्रिआयाम से भी निचले क्षेत्र में रहते हैं मतलब खुद को निम्नतर पाते हैं, शर्म, अपराध
बोध,दुःख, डर में जीते हैं तो वही नर्क है। फिर कुछ लोग कहते हैं कि आत्माएँ भटकती
हैं यह कौन-सा क्षेत्र हुआ? इच्छाओं, क्रोध, अहंकार में रहते हुए आप इसे मान सकते हैं,
यहाँ आप त्रिआयाम में तो है लेकिन वास्तविक अर्थों में जी नहीं रहे होते। यहाँ आपको
लगता है आप पर अत्याचार हो रहे हैं, आप परिस्थितियों के शिकार हैं,आप दबे-कुचले जा
रहे हैं, गालियाँ सुन रहे हैं। उसके बाद चौथा आयाम खुलता है जो भटकाव और कथित स्वर्ग
के बीच का है। इसे दुनियावी अर्थों में समझें तो जब आप साहस, निरपेक्षता, कुछ कर गुज़रने
की इच्छा,स्वीकार करने की भावना में आ जाते हैं। आप खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करने
लगते हैं। फिर स्वर्ग मतलब क्या तो आप अपने बारे में ही नए सिरे से जानने लगते हैं
मसलन आंतरिक समझ, आंतरिक प्रेम। इसके बाद दैव लोक कहा गया है जिसे हम समझ सकते हैं
कि जब हमें आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती है। यह पाँचवाँ आयाम है जो कहता है ‘मैं हूँ’।
खुद को जानना, ‘मैं कौन हूँ’ समझना इस स्थिति में आता है। जिसे अध्यात्म में एकाकार
होना, साक्षी भाव से देखना, अद्वैतावस्था, जागरूकता, गहन शून्य, ईश्वरीय प्रकाश, अनंत
और तुरीय अवस्था को पा लेना होता है।
आप
जान लीजिए कि जब आप खुद को पूरी तरह जीवंत पाते हैं तभी आप जीवित हैं। उस स्पंदन को
महसूस कीजिए, जिसे विज्ञान वायब्रेशंस कहता है। जब आप पूरी तरह एकत्व से स्पंदित हो
जाते हैं तो आपके जीवन से प्रतीक्षा का अंत हो जाता है क्योंकि हर क्षण आप घटित होने
वाली घटनाओं को साक्षी भाव से देखने लगते हैं। आप अकेले रहते हुए भी खुद को पूर्ण मानते
हैं, किसी भी परिस्थिति में आप अपने वायब्रेशंस पर ध्यान देंगे तो आपको लगेगा जब आप
उदास महसूस कर रहे हैं तो दरअसल आपके वायब्रेशंस निम्नतर हो गए हैं इसलिए उत्साह को
जगाए रखिए, खुद को वाइब्रेंट रखेंगे तो आपमें वो जीवंतता रहेगी जो आपको जीवित रखती
है, जिस वजह से आप जीवित कहलाते हैं। सारा खेल आपकी ऊर्जा और संवेदना-स्पंदन का है।
हम
जो भी करते हैं, विश्व हमेशा उस पर अपनी प्रतिक्रिया देता है। ऐसे में बहुत ज़रूरी है
कि आप या हम उच्च आवृत्तियों और सकारात्मक विचारों के वलय में रहें। जब भी आप किसी
को प्रतिक्रिया दें सुनिश्चित कर लें कि क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया भी एक तरह का ऊर्जा
संबंध स्थापित कर लेने का अनुबंध है, जिससे हो सकता है आपका ऊर्जा क्षेत्र प्रभावित
हो जाए और आपकी तंरगें प्रभावित हो जाएँ। आपको प्रतिरोध महसूस होने लगे। प्रतिरोध कब
महसूस होता है जब आप खुद में नहीं रहते और तब आप वर्तमान में भी नहीं रहते। इसलिए कहा
जाता है कि ऐसे लोगों से संपर्क में रहिए जिनके साथ रहने पर आपको लगता है कि मज़बूत
ऊर्जा का निवेश हो रहा है। सशक्त ऊर्जा ही भावनाओं को सशक्त करती है और वही आपके विचारों
को मज़बूती प्रदान करती है। मजबूत महसूस कीजिए।
कुछ
महसूस करना मतलब क्या होता है? इसका वस्तुनिष्ठ जवाब नहीं दिया जा सकता। यह व्यक्ति
सापेक्ष है। आपको हमेशा कुछ न कुछ महसूस होता है। जैसे आप जीवन के बारे में कुछ महसूस
करते हैं, आप अपनी परिस्थिति के बारे में महसूस करते हैं। आपके दिमाग में क्या चल रहा
है, आप क्या कह रहे हैं, आपके मन में कैसी छवि तैयार है उससे कुछ नहीं होता, सब कुछ
वायब्रेशंस पर चलता है। इसका अनुभव ऐसे होता है कि कुछ लोग बड़ी मीठी-मीठी बातें करते
हैं तब भी आपको नहीं सुहाते क्योंकि उनसे उत्सर्जित तरंगों से आप प्रभावित नहीं होते।
कई लोगों को पता ही नहीं होता कि वे किन ऊर्जाओं से घिरे होते हैं और इसलिए लगातार
नकारात्मक होते जाते हैं। आपको भी कई बार लगता होगा कि किसी से मिलने पर आप एकदम नकारात्मक
हो जाते हैं और किसी से मिलकर आप चहक उठते हैं। तो ऐसे लोगों के साथ रहिए जिनके साथ
रहना आपको उल्लसित करता है क्योंकि उनकी तरंगें आपकी तरंगों को नीचे नहीं खींचतीं,
ऊपर की ओर ले जाती हैं। वाइब्रेशंस को देखा नहीं जा सकता, मापा नहीं जा सकता लेकिन
समझा जा सकता है। जब कभी नकारात्मक विचार आए तुरंत ‘क्लियर’, ‘कैंसल’ और ‘रिलीज़’ की
कुंजियों को चुन लीजिए। आपकी तरंगें ही सब कुछ हैं तो उन्हें सकारात्मक ही रखना है।
सकारात्मक ऊर्जा को अपनी हर कोशिका में भर लीजिए।
जब
आप दो-दो सीढ़ियाँ लाँघकर ऊपर चढ़ना चाहते हैं तो आप थकते हैं। तब आप लिफ्ट का सहारा
लेते हैं। आपके विचार और आपकी आस्थाएँ आपके लिए सहायक होनी चाहिए, वे लिफ्ट की तरह
काम करनी चाहिए। यदि आप किसी साइकिल या कार रेस में भाग लेने वाले होते हैं तो सबसे
पहले आप यह देखते हैं कि आपकी गाड़ी सुस्थिति में है या नहीं। इसी तरह आपको खुद को भी
अपने आपको शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और अध्यात्मिक तौर पर भी सुस्थिति में रखना है
तभी आप लंबी दौड़ लगा पाएँगे। जब आप तैयार हो जाएँ तो थोड़ा शांति से बैठिए और फिर अपने
वाहन का या जीवन की गाड़ी का ऐक्सलेटर बढ़ा लीजिए।
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