कला वसुधा लखनऊ के नवीनतम् अंक में...

 





विरासत की गगरी और फिसलन वाली ऊँची चढ़ाई

नृत्य गुरू सविता गोडबोले को याद करते हुए...

 (जन्म 8 जनवरी 1952, मृत्यु 4 सितंबर 2021)

स्वरांगी साने

पुराने बाड़ों को याद कीजिए, उनमें प्रवेश के दो दरवाज़े होते थे, एक आगे का जो सीधे बैठक में खुलता और दूसरा पीछे का, जो मुख्य घर में प्रवेश करा देता। आगे का दरवाज़ा भले ही बंद रहे लेकिन पीछे का दरवाज़ा हमेशा खुला होता था। उन दिनों का चलन भी कुछ ऐसा था कि लोग खुद ही अपनी सीमा जान लिया करते थे और उन्हें लाँघा भी नहीं करते थे। औपचारिक लोग आगे के दरवाज़े से बाकायदा दरवाज़े की साँकल, कुंडी या बैल बजाकर आते और अनौपचारिक रिश्तों के लिए पिछला दरवाज़ा अलसुबह से देर रात तक हमेशा खुला रहता।

मध्यप्रदेश के शहर इंदौर के मध्य में स्थित आड़ा बाज़ार इलाके में ऐसा ही एक केलकरों का बाड़ा था। उसका अगला हिस्सा आड़े बाज़ार में खुलता और पिछला हिस्सा बड़ा रावला इलाके में। अगले हिस्से में नीचे साँगली के डॉक्टर उदय गोडबोले अपनी प्रैक्टिस करते और ऊपर सविता गोडबोले और उनकी शिष्याएँ नृत्य की प्रैक्टिस करती थीं। खास शिष्याओं के लिए पिछला दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था। ऐसे ही नीचे से आवाज़ देते हुए मैं ऊपर जाया करती थीं- ताsई... (मराठी संबोधन),ऊपर से आवाज़ आती कौन, स्वरांगी?...मेरे हाँ कहने पर ताई कहती आते हुए वो मँजे हुए बर्तन रखे हैं, वे भी ऊपर ले आना। इसमें ऐसा कोई भाव नहीं होता था कि इसे कैसे काम के लिए कहें, अपनत्व का सोता बह रहा होता था और उसमें कोई काम, काम जैसा लगता भी नहीं था। ऐसे ही उस दिन उन्होंने कहा, नीचे भरकर रखी हुई गगरी ले आना। पुराने बाड़े की लकड़ी की ऊँची सीढ़ियाँ जर्जर हो चुकी थीं और उनमें ऐसा अंतर भी था कि ज़रा पैर इधर से उधर हुआ तो नीचे धँसे समझो। एक कंधे पर बैग, पैरों में हाई हील की चप्पल, सलवार-कुर्ती और दुपट्टा और पानी से भरी गगरी...सारी सर्कस करते हुए मैं ऊपर पहुँची। ताई ने पूछा- क्या सोच रही थी? मैं कहाँ कुछ सोच रही थी, सारा ध्यान गागर में था, संतुलन बनाए रखने में था...और कुछ दिमाग में आना संभव भी नहीं था। मैंने जवाब दिया- कुछ नहीं सोच रही थी, बस पानी न गिरे, मैं न गिरूँ, इतना ही ध्यान था। मैं खिलखिलाकर हँस दी। चप्पल उतार पानी की गगरी रसोई में रख आई।

तब सविता ताई ने पास बुलाकर समझाया- देखा, इस वक्त तुम्हारे मन में और कोई विचार नहीं आया न। हमेशा इस बात को ध्यान रखना कि तुम्हारे हाथ में विरासत की गगरी है और फिसलन वाली ऊँची चढ़ाई है, ज़रा भी संतुलन बिगड़ा, तो सीधे नीचे गिरोगी और कोई बचाने भी नहीं आएगा। गुरू की यह बात गाँठ बाँधने वाली थी। मैंने कहा- ध्यान रखूँगी। तब उन्होंने बताया कि कथक के लखनऊ घराने के पंडित लच्छू महाराज जी ने भी उनसे ऐसा ही कुछ कहा था कि कथक की चाकरी तो करना, पर नौकरी मत करना। नौकरी करने से कला भ्रष्ट होती है और मैंने भी कहा था- ध्यान रखूँगी, इसलिए कभी नौकरी नहीं की।   

ऐसी कितनी ही छोटी-छोटी बातें वे बातों-बातों में बता देती थीं। कभी ग़लती हो जाए तो डाँट भी लगाती थीं। गुरू की गाली भी आशीष की तरह होती है, ऐसा क्यों कहा जाता है? इसे समझने के लिए गुरू की गाली खाने का सौभाग्य मिलना ज़रूरी है, तब पता चलता है कितने प्यार, दुलार, अपनत्व और स्नेह से गुरू के मुँह से प्रसाद की तरह गाली झरती है, पीठ पर थौल पड़ती है।

कथक के लखनऊ घराने के पंडित लच्छू महाराजजी से मंगला नातू ने कथक सीखा। विवाह के बाद वे उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र के सांगली में आई, नातू से गोडबोले हुई और वहाँ से जब इंदौर पहुँची तो अपनी शिष्याओं के बीच सविता ताई (मराठी संबोधन, जिसका अर्थ दीदी) हो गई। सविता ताई के मुँह से कोई ‘कमबख़्त’ शब्द सुन ले तो उसे उस शब्द से ही रश्क हो जाए। मराठी में गोडबोले का अर्थ होता है मीठा बोलने वाला, गोड मतलब मीठा खाना उनकी कमज़ोरी थी, लखनऊ का मीठा अंदाज़ उनकी ज़ुबान पर था पर बोली इतनी खड़ी थी कि कोई अनजाना चकरा ही जाए। समाज, व्यवस्था या ढर्रे या किसी व्यक्ति पर रोष व्यक्त करती, तब भी वे ‘कमबख़्त’ कहती लेकिन तबके कहने और अपनी किसी प्रिय शिष्या को ‘कमबख़्त’ कहने में बहुत अंतर होता, तब उनकी आँखें, उनकी मुस्कान और उनके चेहरे पर वात्सल्य भाव देखते बनता था, शायद ऐसा ही कुछ यशोदा मैया का कान्हा के लिए उमड़ता होगा।

सविता ताई हमेशा कहा करती थी, हर क्षण का गहराई से अवलोकन करो और उसका उपयोग आगे किसी प्रस्तुति में करो। किसी ठुमरी या पद में जो भाव है उसे पकड़ने के लिए शब्दों का आलंबन तो लो ही लेकिन उसके पीछे की अभिधा, लक्षणा, व्यंजना को भी खोजो और उससे भी आगे चलकर ‘बिटवीन द लाइंस’ और ‘बियॉन्ड द लाइंस’ अपने क्षितिज को विस्तार दो। अपनी शिष्याओं को अवलोकन करने के लिए कहने से पहले वे इस गुण को अपने जीवन में उतार चुकी थीं। अपनी यात्रा को याद करते हुए एक बार उन्होंने बताया था कि कैसे लच्छू महाराज जी पहले-पहल उन्हें सिखाने को तैयार नहीं थे, और परीक्षा लेने के लिए ही जैसे एक कोने में खड़े रह छह महीने तक केवल ततकार और हस्तक करते रहने को कहा था।

किस्सा कुछ यूँ हुआ था कि जब लच्छू महाराज जी मुंबई से लखनऊ आए थे, कथक केंद्र में सिखाने तब सविता ताई ने उनसे सीखने की इच्छा जाहिर की। महाराज जी ने उन्हें देखते ही कह दिया कि ऐडमिशन फ़ुल हो गए हैं। वे एक समय में केवल पाँच शिष्याओं को ही सिखाते थे। ऐडमिशन फ़ुल कहने की दूसरी वजह सविता ताई की भारी देहयष्टि थी। महाराज जी को लगा कि यह क्या सीखेगी! उनके मना करने पर भरी दुपहरी में घंटों सविता ताई वहीं बाहर खड़ी रोती रही, महाराज जी ने इस लगन को देखा और दूसरे दिन से कक्षा में आने की अनुमति दे दी। सविता ताई की बेटी इस याद को दोहराते हुए कहती हैं- तब कपिला शर्मा जी, कुमकुम धर जी सबको महाराज जी सिखाते थे लेकिन आई (मराठी में माँ) को नहीं। आई भी बड़ी ठिठाई से छह महीने तक घुँघरू बाँधे केवल रियाज़ करती रही। उसके बाद जब उस साल महाराज जी का जन्मदिन (1 सितंबर) आया तो सभी शिष्याओं ने प्रस्तुति दी। आई ने भी दी। आई ने वो करके दिखाया, जो महाराज जी ने उन्हें सिखाया ही नहीं था। जब वे दूसरी शिष्याओं को सिखाते थे तब आई देखती और देख-देखकर सीख गई थी।

महाराज जी इससे बहुत खुश हुए और तबसे सविता ताई को सिखाने लगे, लेकिन वह सिखाने का भी उनका अपना अंदाज़ था। चूँकि वे एक बार नाराज़गी दिखा चुके थे इसलिए बाद में भी वे किसी और को सिखाते तो ताई की ओर देख आँखों से इशारा करते कि देखो, इसे ऐसा करना है। ताई समझ जाती कि यह उनके लिए बताया जा रहा है और जो सिखाया जा रहा होता, उसे आत्मसात् कर लेती। इंदौर के पागनीसपागा स्थित बाल निकेतन विद्यालय में जब उन्होंने शाम को कथक की कक्षाएँ लेना शुरू कीं, तो उन्होंने हर शिष्या का ध्यान रखा, शायद यह उनके भीतर की उस समय की टीस थीं और वे किसी शिष्या को उस पीड़ा से गुज़रते नहीं देख सकती थी। जब वे ‘गिनती के बोल’ सिखाती तो हर शिष्या से कहती देखो एक, दो, तीन...नौ को किस तरह से त्रिताल की सोलह मात्राओं में बैठा सकते हैं, गोया परमिंटेशन-कॉम्बीनेशन का अलग गणित वे साथ-साथ समझाती जाती...जबकि हम सीखने वाले, आस्था और मैं और बाकी सभी बमुश्किल प्राथमिक कक्षाओं में थे लेकिन हँसते-खेलते नृत्य, भाषा (कवित्त आदि को समझते हुए), अभिनय और गणित एक-साथ सीख रहे थे।

विज्ञान की ओर उनके रुझान की एक वजह यह भी थी कि उन्होंने बीएससी किया था, खैरागढ़ विश्वविद्यालय से कथक में एम.ए. तो उन्होंने शादी के बाद इंदौर आने पर किया। इसका भी एक किस्सा है। बीएससी के बाद उनके पिता श्री माधव चाहते थे कि वे एमएससी करें और प्रोफ़ेसर बने लेकिन ताई ने मना कर दिया। पं. लच्छू महाराज जी तब तक भातखंडे परिसर में कथक केंद्र में कथक सिखाने लगे थे और ताई को कथक ही सीखना था। पिता-पुत्री में तब अच्छा खासा वाक्-युद्ध हुआ लेकिन अंततः बेटी की जिद के आगे पिता को झुकना पड़ा। ताई ने अपना स्कूटर निकाला और कथक केंद्र पहुँच गई, जहाँ महाराज जी ने उन्हें नकार दिया।

उनकी कथक सीखने की शुरुआत कानपुर में केडी श्रीवास्तव मास्टर साहब से हुई थी। तब वे अपनी बुआ के यहाँ रहती थी और पाँच साल की नन्ही मंगला इस खुशी में रियाज़ करती कि रियाज़ करने पर कैंडी खाने को मिलेगी इस खुशी में वे कथक सीखने लगी थी। दरअसल बुआ तो उन्हें अपने साथ गायन की रियाज़ में बिठाती पर ताई का मन गाने में नहीं रमता था। वे आसपास के बच्चों के साथ खेला करतीं और खेल-खेल में अनारकली बन उस अंदाज़ में चला करती थीं। यह देख उनकी बुआ को लगा कि इसे नृत्य की कक्षा में डाला जाना चाहिए। यह कक्षा लालमणि मिश्रा जी के स्कूल में लगती थी, लेकिन ताई वहाँ भी खेलती रहती, सीखती नहीं थी। डॉक्टर का घर था बैंडेज मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी। कभी हाथ पर, कभी सिर पर पट्टी बाँध लेती ताकि नृत्य न करने का बहाना मिल जाए। इसलिए लालमणि मिश्राजी उन्हें दुलारते हुए चॉकलेट का मोह जगाते थे। किसे पता था कि छोटी मंगला को दिया गया कैंडी का लालच उनके मन में कथक के प्रति ऐसी लौ लगा देगा कि आगे चलकर उन्हें उसके बाद और कोई मोह कभी रहा ही नहीं। कानपुर के ख्यातनाम फ़िजिशियन श्रीनिवास कुंटे सविता ताई के फूफाजी, आठवीं तक की पढ़ाई सविता ताई की कानपुर के सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल में ही हुई, वहाँ वे इकलौती लाड़ली थी। आठवीं के बाद वे अपने पिता के यहाँ आई तो यहाँ संयुक्त परिवार था, हर कोई कुछ न कुछ गाना-बजाना सीख रहा था और ताई को भी लगा कि इसे गंभीरता से करना चाहिए। स्कूली पढ़ाई के साथ गांधर्व महाविद्यालय से नृत्य प्रभाकर और प्रयाग संगीत समिति से उन्होंने नृत्य विशारद की उपाधि प्राप्त की। बाद में उन्हें संगीत नाटक अकादमी से कथक के लिए वरिष्ठ छात्रवृत्ति मिलने लगी तो पिता ने कहा कि तुम्हारा रहना-खाना तो घर में हो रहा है, इस स्कॉलरशिप का उपयोग अपने कथक के लिए करो। यह वर्ष 1971 की बात है, तब उन्हें 100 रुपए महीना स्कॉलरशिप मिलती थी, यह उस ज़माने के हिसाब से बड़ी राशि थी। ताई ने भाई मियाँ अफ़ाक हुसैन खाँ साहब से इल्तिज़ा की कि वे तबले पर उनके रियाज़ के लिए घर आया करें। भाई मियाँ ने टालने के लिए ऐसे ही कह दिया कि ठीक है महीने में एक बार आऊँगा और सौ रुपए लूँगा, उन्हें लगा था कि ताई मना कर देंगी लेकिन सविता ताई राजी खुशी राजी हो गई। जो स्कॉलरशिप के पैसे आते थे, वे तबले के साथ रियाज़ पर जाने लगे। 

यह वर्ष इतना याद रखने जैसा इसलिए है क्योंकि इसी वर्ष वे महाराज जी से कथक सीखने लगी थीं। महाराज जी ने तो पहले मना कर दिया था, छह महीने केवल ततकार किया। शायद इसी दौरान उनमें खुद में खुद से सुधार करने की प्रवृत्ति जगी। दूसरे के पास सीखकर आने के बाद नई शैली अपनाने में आने वाली दिक्कतों को वे करीब से जान पाई और आगे चलकर अपनी शिष्याओं के प्रति उन्होंने यह सदाशयता रखी। कोई किसी अन्य से सीखकर उनके पास सीखने आता, कड़क हाथ-पैर लेकर नाचता तो वे पूरा समय देकर उसे अपनी शैली में मोल्ड करती थीं। खैर, तो बात उस वर्ष की। वे बड़ी तन्मयता से महाराजजी के लास्य अंग उनकी ‘कलास’ को देखती और देख-देखकर सीखती जा रही थीं। उनके साथ की अन्य शिष्याएँ महाराजजी से बरसों से सीखती आ रही थीं तो उनके स्तर तक पहुँचना अपने आप में एक चुनौती थी। दूसरी भीतरी राजनीति भी आड़े आ रही थी। ‘चंद्रावली’ में उन्हें लीड रोल मिला लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया, उन पर तंज कसे जाते रहे। उन्हें एक छोटा-सी भूमिका मिली कि लड़की के पीछे भैंस पड़ जाती है, कुछ सेकंड के लिए वे मंच पर आती हैं और निकल जाती हैं। अब तक के सारे द्वंद्व, लांछन, पीड़ा, दुत्कार, अवहेलना को उन्होंने उस भूमिका में साकार कर दिया। मंच पर भैंस नहीं दिखती लेकिन भैंस पीछे पड़ने पर भागते हुए चेहरे पर क्या भाव आएँगे, वे सारे भाव उनके चेहरे पर आ गए। उस नृत्यनाटिका के बाद महाराज जी सभी कलाकारों का परिचय करा रहे थे, तब निर्माता निर्देशक बंसी कौल ने आगे बढ़कर पूछा था कि वह कौन थी, जिनसे उस लड़की की भूमिका की थी, जिसके पीछे भैंस पड़ गई थी। तब लच्छू महाराज जी की आँखों में ताई के लिए जो स्नेह और अभिमान उमड़ा था कि हाँ ये मेरी शिष्या है, उसे याद कर ताई की आँखें हमेशा छलछला जाती थीं। 

बात इसी वर्ष की, इसी वर्ष भाई मियाँ उनके यहाँ आने लगे थे, भाई मियाँ और उनके वालिद आबिद हुसैन खाँ साहब ने जितना स्नेह और साथ ताई को दिया, वह मानीखेज है। हुआ यूँ कि एक बार महाराज जी ने हँसते हुए कहा पखावज पर तो हर कोई नाच लेता है, क्योंकि पखावज पर खड़े बोल पड़ते हैं, पखावज पर नाचना आसान है, तबले पर कोई नाचकर दिखाए तो मानूँ। इसके बाद उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में ताई की ओर देखा, ताई समझ गई कि यह चुनौती उनके लिए ही है, ताई ने कहा-मैं कोशिश करूँगी और तबले पर कथक करने की करामात करने में वे जुट गई, साथ दिया भाई मियाँ ने। इंदौर आने पर उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब के शिष्य शरद खरगोनकर जी के तबले पर वे कथक करती रहीं और उनके बाद उस्तादजी के ही दूसरे शिष्य पं. दिनकर मुजूमदार के यहाँ तालीम होने लगी।

इंदौर की लंबी गलियाँ सविता गोडबोले की पदयात्राओं की साक्षी रही हैं, कितनी-कितनी दूरी वे पैदल ही तय कर लेती थीं। आड़ा बाजार से वे पैदल निकल पड़तीं, भरी दुपहरी, पैदल गमन, कंधे पर भारी घुँघरुओं की थैली और कथक का रियाज़। पंडितजी की बेटी संगीता मुजूमदार (अब अग्निहोत्री) का तबला और सविता ताई के पैरों से हर बोल की निकासी, अद्भुत संगम था। संगीता-स्मिता मुजूमदार (अब वाजपेयी), राकेश श्रीमाल, अलकनंदा साने ने साथ मिलकर लयशाला संगीत अकादमी की नींव भी रखी थी, एक ऐसा सपना जो सबने साथ मिलकर देखा था। संगीत के संजीदा आयोजन करना, लेक्चर-डिमॉन्स्ट्रेशन रखना और इन आयोजनों में प्रभाकर माचवे जी जैसे दिग्गजों को बुलाना। शासकीय संस्कृत महाविद्यालय चिमनबाग पर भी कथक के आयोजन हो सकते हैं, यह इस टीम की सोच की परिणति था। तब प्रभाकर माचवे जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार संपादक व्याख्यान देने आते और हम जैसी नई पौध के लिए यह बहुत सीखने जैसा था। ताई का स्पष्ट मत था कि कला के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की यात्रा होनी ही चाहिए। उनके घर में एक खूबसूरत पेटिंग थी, फूलों से लदे वृक्ष के गुच्छों को एक यौवना तोड़ने की हसरत से छू भर रही है..और वे उसकी भाव-भंगिमाओं को भी समझातीं कि देखो इस चित्र में कैसी लय है, उस देह में कैसी गति है।

अंदर के कमरे में अलमारी पर रघुवीर सहाय की कविता की पंक्तियाँ चस्पा की हुई थीं- जब तुम बच्ची थी, तो मैं तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकता था/ अब तुम रोती हो, तो देखता हूँ मैं। प्रगतिशील काव्यधारा के कवि की ये पंक्तियाँ पढ़ने वाली मैं बच्ची ही थी और केवल शब्दों से मंत्रमुग्ध हो जाती थी। आज ताई के जाने के बाद, मेरे बड़े हो जाने के बाद, अब मैं रोती हूँ तो क्या देखती होगी ताई...

ताई जिन्होंने आँसू भी बहाए तो हर बार फ़ीनिक्स पक्षी की तरह राख के ढेर से निकलकर उडा़न भरी। ऐसा ही एक वर्ष 2008 आया, जब इंदौर से भोपाल की सड़क यात्रा के दौरान बड़ा हादसा हो गया। इस हादसे ने जैसे उनके जीवन की गति को ही मंथर कर दिया और मन को बोझिल। युद्ध में जाना हो और हथियार ही साथ न हो तो किसी सैनिक की क्या अवस्था हो सकती है, वैसा ही कुछ ताई के साथ हुआ। ताई का एक पैर टूट गया, वॉकर का सहारा लेना पड़ा। नर्तक के लिए उसका शरीर ही उसका माध्यम होता है और पैर तो जैसे आत्मा। काका यानी उनके पति व्यवसाय से डॉक्टर थे लेकिन इस बार वे तन का नहीं, मन का इलाज कर रहे थे। उन्होंने ताई को लगातार संबल दिया और बैठकर नृत्य करने का मानसिक बल दिया। लखनऊ घराने में बैठकर प्रस्तुति देने का चलन नया नहीं था, भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था पर ताई ने पूरा नृत्य ही बैठकर दिखा देने का आश्चर्य कर दिखाया।

 इंदौर में कभी किसी ने नाचने वाली कहा तो उसकी ओर इतनी तीखी नज़र से देखा कि कहने वाला भस्म ही हो जाए। बीच बाज़ार, भरी सड़क पर कथक की कक्षाएँ होतीं, नृत्य करती शिष्याओं को गवाक्ष से आसानी से देखा जा सकता लेकिन मजाल है कि कोई सिरफिरा कभी चूँ भी कर दे, इतनी खड़ी बोली में वे बात करतीं कि किसी की हिम्मत ही न हो उन लड़कियों की ओर आँख उठा देखने की। लखनऊ का अदब और नज़ाकत उनके नृत्य में थी व्यवहार में वे मराठन थीं...मतलब एकदम लड़वैया जैसी। वे खुद बतातीं कि पंडित लच्छू महाराज कहते थे मेरे नृत्य को यह मराठन आगे ले जाएगी। लच्छू महाराज जी की इस बात को उन्होंने सिद्ध भी किया, महाराज जी पर डाक टिकट निकालने के लिए कितनी ही कवायदें उन्होंने की थीं और डाक टिकट जारी भी हुआ। महाराज जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, उन्हें हमेशा संदेह होता कि कोई कुछ मिलाकर उन्हें खिला देगा। उनके लिए सुबह-शाम ताई घर से खाना बनाकर टिफ़िन में ले जाती और वे मराठन के हाथ से बना खाना बड़े चाव से खाते।

अपने गुरू की सेवा का फल ही था कि उनके हाथों में साक्षात् अन्नपूर्णा बस गई थीं। बाद में भी वे बड़े-बड़े पतीलों में कुछ-न कुछ पकाती रहती और लोगों को खिलाती रहती। खाने और खिलाने की वे बहुत शौकीन थीं। खाना खिलाते हुए वे प्यार और नेह भी परोस रही होती थीं। देश-विदेश की यात्राएँ कर चुकने के बावजूद ग़जब की शालीनता और सादगी उनके व्यवहार में थी। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि ये उस ज़माने में कॉन्वेंट में पढ़ी हुई है या उनके पिता का लखनऊ में कितना दबदबा रहा है या नातू परिवार बाजीराव के ज़माने में पेशवाओं के सरदार थे या उनके दादाजी लक्ष्मण गंगाधर नातू ग्रांट मेडिकल कालेज में पढ़े, रामपुर के नवाब के यहाँ मेडिकल प्रैक्टेशिनियर थे। इस ओहदे पर होते हुए भी वे किसी की सेवा नहीं स्वीकारते थे, अपना पानी खुद भरते, अपना खाना खुद बनाते थे। उन्होंने सम्मन खाँ साहब के यहाँ ध्रुपद-धमार सीखा, उन्हें पाँच हजार ध्रुपद रचनाएँ याद थीं। रामपुर से वे लखनऊ आए और यहाँ उन्होंने अपना मकान बवनाया। मजदूरों को भूखा काम नहीं करने देते, सत्तू घुला रहता, थक गए हो तो सत्तू खा लो ये दिलदार होना ताई को उनके दादाजी से आया।

दिलदार ताई फलों से लदे वृक्ष के समान थीं और अब जैसे यह वृक्ष ही धराशायी हुआ, इसके साथ कुछ जड़ें भी हिल गईं, कुछ मिट्टी भी उखड़ गई...फिर किसी को ऐसा वृक्ष होने में सालों लग जाएँगे...लेकिन उन लताओं का क्या जो इस वृक्ष को संबल मान चुकी थीं, अब उन लताओं को सहेजना होगा, कुछ पौधों के लिए ऐसी ज़मीन तलाश करना होगी ताकि फिर कोई घना वृक्ष बन पाए।

 

 

 

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