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किस्सा 13 मुनिया की दुनिया

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मुनिया की दुनिया

किस्सा 13

यूँ तो दरवाज़ा खुला था पर वह एक हाथ से दरवाज़ा बजा रही थी..लगातार..थाप पर थाप…और उसी लय में अपना एक पैर हिला रही थी और दूसरा हाथ हवा में लहरा रही थी

मैं और बेटी दरवाज़े के पास आकर खड़े हो गए पर मुनिया की सिम्फनी जारी थी..अपनी ही धुन में मगन ..कुछ देर बाद उसका ध्यान गया कि अरे हम तो दरवाज़े पर ही खड़े हैं और वह बेसाख्ता हँसने लगी… हम माँ-बेटी भी अपनी हँसी रोक नहीं पाए...हमारी समवेत खिलखिलाहट की गूँज से अड़ोस-पड़ोस के बंद दरवाज़े भी खुल गए, कि ‘आखिर क्या हुआ?’


..अरे वाह मुनिया, तुमने तो सिद्ध कर दिया कि आज भी हँसी में बंद दरवाज़ों को खुलवाने की ताकत है।

(क्रमशः)

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